Shaheed Kosh

इनके व्यक्तित्व के बारे में कोई भी तथ्य छूट गया हो या कोई तथ्य त्रुटिपूर्ण तो कृपया ज़रूर बतायें

तात्या टोपे का जन्म सन 1814 ई. में नासिक के निकट पटौदा ज़िले में येवला नामकग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम पाण्डुरंग त्र्यम्बक भट्ट तथा माता का नाम रुक्मिणी बाई था। तात्या टोपे देशस्थ कुलकर्णी परिवार में जन्मे थे। तात्या का वास्तविक नाम ‘रामचंद्र पांडुरंग येवलकर’ था। ‘तात्या’ मात्र उपनाम था। तात्या शब्द का प्रयोग अधिक प्यार के लिए होता था। टोपे भी उनका उपनाम ही था, जो उनके साथ ही चिपका रहा। क्योंकि उनका परिवार मूलतः नासिक के निकट पटौदा ज़िले में छोटे से गांव येवला में रहता था, इसलिए उनका उपनाम येवलकर पड़ा। तात्या टोपे जब मुश्किल से चार वर्ष के थे, तभी उनके पिता के स्वामी बाजीराव द्वितीय के भाग्य में अचानक परिवर्तन हुआ। बाजीराव द्वितीय 1818 ई. में बसई के युद्ध में अंग्रेज़ों से हार गए। उनका साम्राज्य उनसे छिन गया। उन्हें आठ लाख रुपये की सालाना पेंशन मंजूर की गई और उनकी राजधानी से उन्हें बहुत दूर हटाकरबिठूर, कानपुर में रखा गया। यह स्पष्ट रूप से ऐसी स्थिति से बचने के लिए किया गया था कि वह अपने खोए हुए साम्राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए कुछ नई चालें न चल सकें। बिठूर से 12 मील दूर गंगा के तट पर छोटा-सा सुंदर नगर था। वहाँ बाजीराव ने अपने लिए एक विशाल प्रासाद का निर्माण करवाया और अपना अधिकांश समय धार्मिक कार्यकलापों में व्यतीत करने लगे। तात्या टोपे के पिता पेशवा बाजीराव द्वितीय के कर्मचारी तथा उनके वफादार थे, इसीलिए वे भीपरिवार सहित बाजीराव द्वितीय के पास 1818 ई. में बिठूर आ गए। रामकृष्ण टोपे के बयान के अनुसार तात्या अपने पिता की 12 संतानों में से दूसरे थे। उनका एक सगा और छह सौतेले भाई और चार बहनें थीं। यद्यपि तात्या अपने बच्चों के साथ अलग रहते थे, फिर भी सभी व्यवहारिक कार्यों के लिए उनका परिवार संयुक्त परिवार था। तात्या एक अच्छे महत्त्वाकांक्षी नवयुवक थे। उन्होंने अनेक वर्ष पेशवा बाजीराव द्वितीय के तीन दत्तक पुत्र- नाना साहब, बाला साहब और बाबा भट्ट के साहचर्य में बिताए। एक कहानी प्रसिद्ध है कि नाना साहब, उनके भाई, झाँसी की भावी रानी लक्ष्मीबाई, जिनके पिता उस समय सिंहासनच्युत पेशवा के एक दरबारी थे और तात्या टोपे, ये सभी आगे चलकर विद्रोह के प्रख्यात नेता बने। ये अपने बचपन में एक साथ युद्ध के खेल खेला करते थे और उन्होंने मराठों की वीरता की अनेकों कहानियाँ सुनी थीं, जिनसे उन्हें विद्रोह के लिए प्रेरणा प्राप्त हुई थी। उनके विचार से गाथा के इस भाग का ताना-बाना इन वीरों का सम्मान करने वाले देश प्रेमियों के मस्तिष्क की उपज है। वह १८५७ के स्वाधीनता समर का महासेनापति बन गया , यह तात्या के लिए कम गौरव की बात नही थीं | कालपी , ग्वालियर और कानपुर को अपने आधिपत्य में लेने के बाद तात्या ही अंग्रेजो का सर्वाधिक कट्टर शत्रु मना जाने लगा | क्रांति के दिनों में उन्होंने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई एवं नाना साहब का भरपूर साथ दिया. शिवराजपुर के सेनापति के रूप में उन्होंने फौजियों का नेतृत्व किया. कानपुर विजय का श्रेय भी उन्हीं को है. तांत्या ने कालपी को अपने अधिकार में लेकर उसे क्रांतिकारियों का महत्वपूर्ण गढ़ बनाया. जहां एक ओर कई महत्वपूर्ण विजय प्राप्त की, वहीं दूसरी ओर उन्होंने कई बार अंग्रेज सेनापतियों को अपने गुरिल्ला ढंग के आक्रमणों के कारण सकते में डाला | प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की लपटें जब कानपुर पहुँचीं और वहाँ के सैनिकों ने नाना साहब को पेशवा और अपना नेता घोषित किया तो तात्या टोपे ने कानपुर में स्वाधीनता स्थापित करने में अगुवाई की। तात्या टोपे को नाना साहब ने अपना सैनिक सलाहकार नियुक्त किया। जब ब्रिगेडियर जनरल हैवलॉक की कमान में अंग्रेज़ सेना ने इलाहाबाद की ओर से कानपुर पर हमला किया, तब तात्या ने कानपुर की सुरक्षा में अपना जी-जान लगा दिया, परंतु 16 जुलाई, 1857 को उनकी पराजय हो गयी और उन्हें कानपुर छोड़ना पड़ा। शीघ्र ही तात्या टोपे ने अपनी सेनाओं का पुनर्गठन किया और कानपुर से बारह मील उत्तर मे बिठूर पहुँच गये। यहाँ से कानपुर पर हमले का मौका खोजने लगे। इस बीच हैवलॉक ने अचानक ही बिठूर पर आक्रमण कर दिया। यद्यपि तात्या बिठूर की लड़ाई में पराजित हो गये, परंतु उनके नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने इतनी बहादुरी प्रदर्शित की कि अंग्रेज़ सेनापति को भी प्रशंसा करनी पड़ी। तात्या एक कुशल सेनापति थे। पराजय से विचलित न होते हुए वे बिठूर से राव साहेब सिंधिया के इलाके में पहुँचे। वहाँ वे ग्वालियर कन्टिजेन्ट नाम की प्रसिद्ध सैनिक टुकड़ी को अपनी ओर मिलाने में वे सफल रहे। वहाँ से वे एक बड़ी सेना के साथ कालपी पहुँचे। नवम्बर1857 में उन्होंने कानपुर पर आक्रमण किया। मेजर जनरल विन्ढल की कमान में कानपुर की सुरक्षा के लिए स्थित अंग्रेज़ सेना तितर-बितर होकर भागने लगी, परंतु यह जीत थोड़े समय के लिए ही थी। ब्रिटिश सेना के प्रधान सेनापति सर कॉलिन कैम्पबेल ने तात्या को 6 दिसम्बर को पराजित कर दिया। इसलिए तात्या टोपे खारी चले गये और वहाँ नगर पर कब्जा कर लिया। खारी में उन्होंने अनेक तोपें और तीन लाख रुपये प्राप्त किए, जो सेना के लिए जरूरी थे। इसी बीच 22 मार्च को सर ह्यूरोज ने झाँसी पर घेरा डाला। ऐसे नाजुक समय में तात्या टोपे करीब बीस हज़ार सैनिकों के साथ रानी लक्ष्मीबाई की मदद के लिए पहुँचे। ब्रिटिश सेना तात्या टोपे और रानी की सेना से घिर गयी। अंततः रानी की विजय हुई। सारे देश में अंग्रेजी सेना उस समय तांत्या की तलाश कर रही थी और तांत्या क्रांतिकारियों को संगठित करने साथ अंग्रेजों पर छटपट आक्रमण करने में जुटे हुए थे. उस समय उनका नाम शौर्य और साहस का पर्याय बन गया था | तांत्या ने काफी समय तक जंगलों में भटककर कई कष्ट भी झेले. सहसा 7 अप्रैल, 1859 को विश्वसघाती ने उन्हें अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिया. मुकदमे के दौरान तांत्या ने कहा कि मैंने जो कुछ किया है, वह अपने देश की स्वतंत्रता के लिए किया है. इसी वर्ष देश की पहली क्रांती का सूर्य अस्त हुआ | महारानी लक्ष्मी बाई की वीरगति के बाद तो ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी सारी शक्ति केवल तात्या टोपे को गिरफ्तार करने या उसे समाप्त करने में लगा दी |तांत्या ने काफी समय तक जंगलों में भटककर कई कष्ट भी झेले | ७ अप्रैल, १८५९ को जब तात्या अपने मित्र मान सिंह द्वारा बताए सुरक्षित स्थान पर बेफिक्री से गहरी निद्रा में लीन था तो लगभग अर्धरात्रि के समय अंग्रेजी सेना ने उसे दबोच लिया | बंदी तात्या को कड़े पहरे के बीच शिवपुरी में जनरल मिड की छावनी ले जाया गया | उस पर अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध युद्ध करने और कई हत्या का आरोप लगा | सैनिक अदालत ने तात्या को फांसी का दंड सुना दिया | तात्या को फांसी दिए जाने का समाचार सुनकर शिवपुरी की जनता भारत माता के सपूत को देखने के लिए उमड़ पड़ी | कड़े पहरे के बीच फांसी देने का कार्य संपन किया गया | अंग्रेज अफसर निशानी के रूप में रखने के लिए तात्या के सिर से गुच्छे के गुच्छे बाल निकालकर ले गए | इंग्लैंड में आज तक तात्या के बालो का प्रदर्शन करके वीरता की कहानियाँ कही और सुनी जाती हैं | उनका अंत 18 अप्रैल, 1859 को हँसते-हँसते फाँसी के तख्ते पर चढ़ने के साथ समाप्त होता है. देश के प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम को चिरस्मरणीय बनाने का अत्यधिक श्रेय तांत्या टोपे को जाता है | COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan Gyanipandit

General Administration Department
Goverment of NCT of Delhi