Shaheed Kosh

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विजय सिंह पथिक, का जन्म 27 फ़रवरी 1882, को हुआ था | वे भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे । भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले वीर क्रांतिकारियों में से एक थे। उन्हें राष्ट्रीय पथिक के नाम से भी जाना जाता है । उनका जन्म बुलन्दशहर जिले के ग्राम गुठावली कलाँ के एक गुर्जर परिवार में हुआ था । इनके ऊपर अपनी माँ और परिवार की क्रान्तिकारी व देशभक्ति से परिपूर्ण पृष्ठभूमि का बहुत गहरा असर पड़ा था। विजय सिंह पथिक अपनी युवावस्था में ही रासबिहारी बोस और शचीन्द्रनाथ सान्याल जैसे अमर क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आ गए थे। वैसे विजय सिंह पथिक जी का मूल नाम 'भूपसिंह' था, किंतु 'लाहौर षड़यंत्र' के बाद उन्होंने अपना नाम बदल कर विजय सिंह पथिक रख लिया और फिर अपने जीवन के अंत समय तक वे इसी नाम से जाने जाते रहे। महात्मा गाँधी के 'सत्याग्रह आन्दोलन' से बहुत पहले ही पथिक जी ने 'बिजोलिया किसान आन्दोलन' के नाम से किसानों में स्वतंत्रता के प्रति अलख जगाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया था। 1912 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली लाने का निर्णय किया। इस अवसर पर भारत के गवर्नर जनरल लार्ड हाडिंग ने दिल्ली प्रवेश करने के लिए एक शानदार जुलूस का आयोजन किया। उस समय अन्य क्रान्तिकारियों ने जुलूस पर बम फेंक कर लार्ड हार्डिग को मारने की कोशिश की किन्तु वायसराय साफ बच गया। रास बिहारी बोस, जोरावर सिंह, प्रताप सिंह, पथिक जी व अन्य सभी सम्बन्धित क्रान्तिकारी अंग्रेजों के हाथ नहीं आये और वे फरार हो गए। 1915 में रास बिहारी बोस के नेतृत्व में लाहौर में क्रान्तिकारियों ने निर्णय लिया कि 21 फ़रवरी को देश के विभिन्न स्थानों 1857 की क्रान्ति की तर्ज पर सशस्त्र विद्रोह किया जाए। भारतीय इतिहास में इसे गदर आन्दोलन कहते हैं। योजना यह थी कि एक तरफ तो भारतीय ब्रिटिश सेना को विद्रोह के लिए उकसाया जाए और दूसरी तरफ देशी राजाओं की सेनाओं का विद्रोह में सहयोग प्राप्त किया जाए। राजस्थान में इस क्रान्ति को संचालित करने का दायित्व विजय सिंह पथिक को सौंपा गया। उस समय पथिक जी 'फ़िरोजपुर षड़यंत्र' केस के सिलसिले में फ़रार चल रहे थे और 'खरवा' (राजस्थान) में गोपाल सिंह के पास रह रहे थे। दोनों ने मिलकर दो हजार युवकों का दल तैयार किया और तीस हजार से अधिक बन्दूकें एकत्र कीं। दुर्भाग्य से अंग्रेज़ी सरकार पर क्रान्तिकारियों की देशव्यापी योजना का भेद खुल गया। देश भर में क्रान्तिकारियों को समय से पूर्व पकड़ लिया गया। पथिक जी और गोपाल सिंह ने गोला बारूद भूमिगत कर दिया और सैनिकों को बिखेर दिया गया। कुछ ही दिनों बाद अजमेर के अंग्रेज़ कमिश्नर ने पाँच सौ सैनिकों के साथ पथिक जी और गोपाल सिंह को खरवा के जंगलों से गिरफ्तार कर लिया और टाडगढ़ के क़िले में नजरबंद कर दिया। इसी समय 'लाहौर षड़यंत्र केस' में पथिक जी का नाम उभरा और उन्हें लाहौर ले जाने के आदेश हुए। किसी तरह यह खबर पथिक जी को मिल गई और वे टाडगढ़ के क़िले से फ़रार हो गए। गिरफ्तारी से बचने के लिए पथिक जी ने अपना वेश राजस्थानी राजपूतों जैसा बना लिया और चित्तौड़गढ़ में रहने लगे। 1920 में विजय सिंह पथिक अपने साथियों के साथ 'नागपुर अधिवेशन' में शामिल हुए और बिजोलिया के किसानों की दुर्दशा और देशी राजाओं की निरंकुशता को दर्शाती हुई एक प्रदर्शनी का आयोजन किया। गाँधीजी पथिक जी के 'बिजोलिया आन्दोलन' से प्रभावित तो हुए, परन्तु उनका रुख देशी राजाओं और सामन्तों के प्रति नरम ही बना रहा। कांग्रेस और गाँधीजी यह समझने में असफल रहे कि सामन्तवाद साम्राज्यवाद का ही एक स्तम्भ है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विनाश के लिए साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के साथ-साथ सामन्तवाद विरोधी संघर्ष आवश्यक है। गाँधीजी ने 'अहमदाबाद अधिवेशन' में बिजोलिया के किसानों को 'हिजरत' (क्षेत्र छोड़ देने) की सलाह दी। पथिक जी ने इसे अपनाने से इनकार कर दिया। सन 1921 के आते-आते पथिक जी ने 'राजस्थान सेवा संघ' के माध्यम से बेगू, पारसोली, भिन्डर, बासी और उदयपुर में शक्तिशाली आन्दोलन किए। 'बिजोलिया आन्दोलन' अन्य क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया था। ऐसा लगने लगा मानो राजस्थान में किसान आन्दोलन की लहर चल पड़ी है। इससे ब्रिटिश सरकार डर गई। इस आन्दोलन में उसे 'बोल्शेविक आन्दोलन' की प्रतिछाया दिखाई देने लगी थी। दूसरी ओर कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन शुरू करने से भी सरकार को स्थिति और बिगड़ने की भी आशंका होने लगी। अंतत: सरकार ने राजस्थान के ए. जी. जी. हालैण्ड को 'बिजोलिया किसान पंचायत बोर्ड' और 'राजस्थान सेवा संघ' से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया। शीघ्र ही दोनो पक्षों में समझौता हो गया। किसानों की अनेक माँगें मान ली गईं। चौरासी में से पैंतीस लागतें माफ कर दी गईं जुल्मी कारिन्दे बर्खास्त कर दिए गए। किसानों की अभूतपूर्व विजय हुई। आंदोलन के कारण विजयसिंह पथिक ब्रिटिश सरकार की आँखों में खटक रहे थे | राजद्रोह का अभियोग लगाकर उन्हें १९२४ में गिरफ्तार कर लिया गया | सन १९२७ के अंत तक पथिकजी को जेल में रहना पड़ा |विजय सिंह पथिक का निधन 28 मई, 1954 में हुआ। इस संसार से विदा होकर शहीदों से मिलने के लिए चल दिए | उनकी देशभक्ति निःस्वार्थ और सच्ची थी। पथिक जी का वर्णन "राजस्थान की जागृति के अग्रदूत महान क्रान्तिकारी" के रूप में किया है। विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में संचालित 'बिजोलिया किसान आन्दोलन' को इतिहासकार देश का पहला 'किसान सत्याग्रह' मानते हैं। Source- Krantikari kosh http://bharatdiscovery.org/

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