Shaheed Kosh

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वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय १९०३ में बी.ए. पास करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए | लंदन उस समय भारतीय क्रांतिकारियों का अड्डा बना हुआ था | यह कैसे संभव था कि वीरेन्द्र जैसा प्रभावशाली छात्र उस वातावरण से अछुता रह जाता | उस पर क्रांति का ऐसा रंग चढ़ा कि वह न तो आई.सी.एस. कर सका और न बैरिस्टरी | इंग्लैंड में रहकर ही वीरेन्द्रनाथ ने इंग्लैंड वालों को कैसा लताड़ा | उसमें एक सच्चे क्रांतिकारी का हृदय था और भारत की पराधीनता के प्रति उसके मन में कसक थी | क्रांतिकारियों गतिविधियों में भाग लेने के कारण कॉलेज के दरवाजे भी उसके लिए बंद हो गए थे | वीरेन्द्र ने पत्रकारिता का आश्रय लिया और उसके लेख लंदन के प्रमुख पत्रों में छपने लगे | अपने इस लेखन से वह भारत की स्वाधीनता का पक्ष लेता रहा | COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan

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