Shaheed Kosh

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महादेव गोविन्द रानाडे का जन्म नाशिक के निफड तालुके में 18 जनवरी, 1842 को हुआ था। उन्होंने अपने बचपन का अधिकतर समय कोल्हापुर में गुजारा जहाँ उनके पिता मंत्री थे। 14 साल की अवस्था में उन्होंने बॉम्बे के एल्फिन्सटन कॉलेज से पढ़ाई प्रारंभ की। यह कॉलेज बॉम्बे विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था और महादेव गोविन्द रानाडे इसके प्रथम बी.ए. (1862) और प्रथम एल.एल.बी. (1866) बैच का हिस्सा थे। वे बी.ए. और एल.एल.बी. की कक्षा में प्रथम स्थान पर रहे। प्रसिद्ध समाज सुधारक और विद्वान आर.जी. भंडारकर उनके सहपाठी थे। बाद में रानाडे ने एम.ए. किया और एक बार फिर अपने कक्षा में प्रथम स्थान पर रहे। महादेव गोविन्द रानाडे का चयन प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के तौर पर हुआ। सन 1871 में उन्हें ‘बॉम्बे स्माल काजेज कोर्ट’ का चौथा न्यायाधीश, सन 1873 में पूना का प्रथम श्रेणी सह-न्यायाधीश, सन 1884 में पूना ‘स्माल काजेज कोर्ट’ का न्यायाधीश और अंततः सन 1893 में बॉम्बे उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया। सन 1885 से लेकर बॉम्बे उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने तक वे बॉम्बे विधान परिषद् में रहे। सन 1897 में रानाडे को सरकार ने एक वित्त समिति का सदस्य बनाया। उनकी इस सेवा के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘कम्पैनियन ऑफ़ द आर्डर ऑफ़ द इंडियन एम्पायर’ से नवाज़ा। उन्होंने ‘डेक्कन अग्रिकल्चरिस्ट्स ऐक्ट’ के तहत विशेष न्यायाधीश के तौर पर भी कार्य किया। वे बॉम्बे विश्वविद्यालय में डीन इन आर्ट्स भी रहे और विधार्थियों के जरूरतों को पूरी तरह से समझा। आत्माराम पांडुरंग, डॉ आर.जी. भंडारकर और वी.ए.मोदक के साथ उन्होंने ‘प्रार्थना समाज’ के स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रह्म समाज से प्रेरित इस संगठन का उद्देश्य था वेदों पर आधारित एक प्रबुद्ध आस्थावाद का विकास। ‘प्रार्थना समाज’ के संस्थापक थे केशव चन्द्र सेन जिनका लक्ष्य था महाराष्ट्र में धार्मिक सुधार लाना। महादेव गोविन्द रानाडे ने अपने मित्र वीरचंद गाँधी को सम्मानित करने के लिए एक सभा की अध्यक्षता की। वीरचंद गाँधी ने सन 1893 में शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म संसद’ में हिन्दू धर्म और भारतीय सभ्यता का जोरदार पक्ष रखा था। महावेद गोविन्द रानाडे ने पूना सार्वजानिक सभा, अहमदनगर शिक्षा समिति और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हें गोपाल कृष्ण गोखले का गुरु माना जाता है तथा बाल गंगाधर तिलक के राजनीति और सोच का विरोधी भी माना जाता है। रानाडे ने सोशल कांफ्रेंस मूवमेंट की स्थापना की और सामाजिक कुरीतियाँ जैसे बाल विवाह, विधवाओं का मुंडन, शादी-विवाह और समारोहों में जरुरत से ज्यादा खर्च और विदेश यात्रा के लिए जातिगत भेदभाव का पुरजोर विरोध किया। इसके साथ-साथ उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा पर भी बल दिया। वे ‘विधवा विवाह संगठन’ (जिसकी स्थापना सन 1861 में हुई थी) के संस्थापकों में से एक थे। हालाँकि रानाडे ने अंधविश्वासों और कुरीतियों का जमकर विरोध किया पर अपने निजी जीवन में वे खुद रुढ़िवादी थे। जब उनकी पहली पत्नी का देहांत हुआ तब उनके सुधारवादी मित्रों ने ये उम्मीद की कि रानाडे किसी विधवा से विवाह करेंगे पर अपने परिवार के दबाव के चलते उन्होंने एक कम उम्र की लड़की (रमाबाई रानाडे) से विवाह किया। उन्होंने रमाबाई को पढाया-लिखाया और उनकी मृत्यु के बाद रमाबाई ने ही उनके सामाजिक और शैक्षणिक कार्यों को आगे बढ़ाया। रमाबाई ने अपने संस्मरण में लिखा है कि जब पुणे के एक सुधारवादी विष्णुपंत पंडित ने एक विधवा से विवाह किया तब उनके सम्मान में महादेव गोविन्द रानाडे ने उनका स्वागत अपने घर पर किया जिसके स्वरुप उनके रुढ़िवादी पिता नाराज़ होकर घर छोड़कर जाने लगे और जब रानाडे ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ने की धमकी दी तब जाकर उन्होंने अपना मन बदला। महादेव गोविंद रानाडे ने 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' की स्थापना का समर्थन किया था और 1885 ई. के उसके प्रथम मुंबई अधिवेशन में भाग भी लिया। राजनीतिक सम्मेलनों के साथ सामाजिक सम्मेलनों के आयोजन का श्रेय उन्हीं को है। वे मानते थे कि मनुष्य की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक प्रगति एक दूसरे पर आश्रित है। अत: ऐसा व्यापक सुधारवादी आंदोलन होना चाहिए, जो मनुष्य की चतुर्मुखी उन्नति में सहायक हो। वे सामाजिक सुधार के लिए केवल पुरानी रूढ़ियों को तोड़ना पर्याप्त नहीं मानते थे। उनका कहना था कि रचनात्मक कार्य से ही यह संभव हो सकता है। वे स्वदेशी के समर्थक थे और देश में निर्मित वस्तुओं के उपयोग पर बल देते थे। देश की एकता उनके लिए सर्वोपरी थी। उन्होंने कहा था कि- "प्रत्येक भारतवासी को यह समझना चाहिए कि पहले मैं भारतीय हूँ और बाद में हिन्दू, ईसाई, पारसी, मुसलमान आदि कुछ और। देश की भरपूर सेवा करने वाले और समाज को नई राहें दिखाने वाले गोविंद रानाडे का निधन 16 जनवरी, 1901 ई. में हुआ। source- http://www.gyanipandit.com/ , http://www.bharatdarshan.co.nz/,

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