Shaheed Kosh

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– रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवम्बर 1835 वाराणसी जिले के भदैनी नामक नगर में हुआ था । उनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था, परन्तु प्यार से उसे मनु कहा जाता था | भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई वास्तविक अर्थ में आदर्श वीरांगना थीं। सच्चा वीर कभी आपत्तियों से नहीं घबराता है। प्रलोभन उसे कर्तव्य पालन से विमुख नहीं कर सकते। उसका लक्ष्य उदार और उच्च होता है। उसका चरित्र अनुकरणीय होता है। अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं महारानी लक्ष्मीबाई | समस्त विश्व को वीरता का र्माग दिखाने वाली शौर्य, तेज, दया, करुणा और देशभक्ती का जज्बा जिसके रग रग में भरा हुआ था। मनु का विवाह सन् 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। 1851 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई किन्तु विधाता ने तो उन्हें किसी खास प्रयोजन से धरती पर भेजा था। पुत्र की खुशी वो ज्यादा दिन तक न मना सकीं दुर्भाग्यवश शिशु तीन माह का होते ही चल बसा। गंगाधर राव ये आघात सहन न कर सकें और लोगों के आग्रह पर उन्होने एक पुत्र गोद लिया जिसका नाम दामोदर राव रखा गया। गंगाधर की मृत्यु के पश्चात जनरल डलहौजी ने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई पहले पुत्र का शोक उभरा भी नही था ओर दूसरा दुःख आ गया लेकिन लक्ष्मीबाई ने हिम्मत रखी | महाराजा की मृत्यु के बाद तत्कालीन गर्वनर जनरल ने दामोदर राव को उत्तराधिकारी बनाने से मना कर दिया क्योंकि दामोदर गोद लिया हुआ बच्चा था और अंग्रेज नियमो के अनुसार सिंहासन का उत्तराधिकारी केवल खुद के वंश का पुत्र ही बन सकता था | रानी लक्ष्मीबाई ये कैसे सहन कर सकती थीं। उन्होने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बजा दिया और घोषणा कर दी कि मैं अपनी झांसी अंग्रेजों को नही दूंगी। मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की वीरांगना थीं जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में ब्रिटिश साम्राज्य की सेना से संग्राम किया और रणक्षेत्र में वीरगति प्राप्त की किन्तु जीते जी अंग्रेजों को अपनी झाँसी पर कब्जा नहीं करने दिया । झाँसी 1857 के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया । 1857 के स्वाधीनता संग्राम ने हमें झाँसी की रानी दी और झाँसी की रानी ने हमे स्वाधीनता संग्राम दिया | युद्ध की मोरचाबंदी करने में महारानी लक्ष्मीबाई की प्रतिभा का चमत्कार देखने को मिला है | उन्हें पत्थर में भी प्राण फूंकने आता था |उसकी सेना की वीरांगनाए भी बिधुल्लता की भांति शत्रु सेना का सर्वनाश करना जानती थी | महारानी लक्ष्मी बाई की सेना वीरांगनाए पुरुषों की भांति ही तलवार चलाती थी और तोंपे दागती थी | 17 जून को ग्वालियर के युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हो गयी | अंग्रेजो ने तीन बाद ग्वालियर के किले पर भी कब्जा कर लिया |अंग्रेजो ने खुद रानी लक्ष्मीबाई को एक वीर योद्धा कहा था जो मरते दम तक लडती रही | उनके इस साहसिक कार्य के लिए भारतीय स्वतंत्रता आंदोंलन की वीर कहा जाने लगा | रानी लक्ष्मि बाई का मुख्य उद्देश्य अपने दत्तक पुत्र को सिंहासन पर बिठाना था | रानी लक्ष्मीबाई 18 जून 1858 को वीरगति को प्राप्त हो गई | भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित करने वाली झाँसी की रानी एक आदर्श वीरांगना थी। COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan

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