Shaheed Kosh

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किशनसिंह गडगज्ज बहुत उग्र विचारों के हौसले वाले व्यक्ति थे | जब उन्हें यह समाचार मिला कि अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में १३ अप्रैल को ठीक वैशाखी के त्यौहार के दिन अंग्रेजी फ़ौज ने निहत्थी और निर्दोष जनता पर अंधाधुंध गोलियां चलाकर सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया हैं , तो उसका खून खौल उठा और अपनी नौकरीजन्य विवशता के प्रति स्वयं पर ग्लानि हुई | उसका चितन था कि गोली चलने का हुक्म भले ही अंग्रेज अफसरों ने दिया हो , पर गोलियां तो फ़ौज के हिंदुस्तानी सिपाहियों ने ही अपने हिंदुस्तानी भाई - बहनों और बच्चों पर चलाई हैं | केवल पेट भरने के लिए ही आदमी अपने सगे-सम्बन्धियों का खून करे , यह चिंतन उसे विचलित करने लगा | आतंरिक आक्रोश तथा ग्लानि का परिणाम यह निकला कि किशन सिंह गडगज्ज ने फ़ौज कि नौकरी छोड़ दी और अकाली दाल में सम्मिलित हो गए | नौकरी छोड़ने का कारण उन्होंने इन शब्दों में प्रकट किया - " सरदार अजीतसिंह कि नज़रबंदी , दिल्ली के रकाबगंज के गुरूद्वारे की दिवार तोड़े जाने , बजबज में निर्दोष यात्रियों पर गोली चलाने . रौलेट एक्ट एवं जालियाँवाला बाग़ हत्याकांड और मार्शल लॉ आदि बातों के कारण मेरे ह्रदय में घृणा उत्पन हो गई तथा गुलामी के बोझ को और अधिक न सह पाने के कारण मैंने सरकारी नौकरी छोड़ दी |" दल में शामिल होकर किशन सिंह गडगज्ज उसके द्वारा संचालित असहयोगात्मक आंदोलन में भाग लेने लगे | धीरे - धीरे इस कार्यक्रम से भी उन्हें अरुचि हो गई | उसका कारण यह था कि उन्हें यह बात नही जँची कि पुलिस हमारे ऊपर डंडा व गोलियां चलाये और हम अहिंसात्मक आंदोलन के बहाने पुलिस की मार खाते रहें तथा गोलियों से मरते रहें ; जबकि हमारे खून में उनके खून से इसी प्रकार के विचारों से प्रेरित होकर किशन सिंह ने एक संगठन खड़ा किया जिसका नाम 'चक्रवर्ती दल ' रखा | किशन सिंह के कार्यक्रम से आकर्षित होकर उन्हीं जैसे गरम विचारों वाले कर्मसिंह एवं उदयसिंह जब उनके साथ आ मिले तो 'चक्रवर्ती दल ' का नाम बदलकर "बब्बर अकाली आंदोलन " के नाम से विख्यात हुआ | बब्बर अकाली नाम से एक पत्रिका भी प्रकाशित की जाने लगी | बब्बर अकाली दल की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर सरकार के कान खड़े हो गए | इस क्रांतिकारियों से निपटने के लिए पुलिस ने भी भेदियों को अधिक प्रलोभन दिए और क्रांतिकारियों पर अपने जाल फेंकने का काम तेज़ कर दिया | आखिर किशन सिंह पुलिस के जाल में फंस गए और उन्हें गिरफ्तार करके लाहौर भेज दिया गया | २७ फरवरी,१९२६ को फाँसीके फंदे पर लटका दिया गया | COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan

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