Shaheed Kosh

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लाहौर की एक मस्जिद में आमसभा हो रही थी | वहां उस मस्जिद में खुदा ताला से इसलिए दुआ माँगी जा रही थी कि वह उनके वतन को आजादी अता फरमाए | वहां एक युवक खड़ा होकर हुंकार भरता है - " मेरे बुजुर्गो और दोस्तों ! खुदा के इस घर में बैठकर आज हम कसम खाते है कि देश कि आज़ादी के लिए हम अपना खून बहते हुए जरा भी नही हिचकेंगे | जालिम हुकूमत ने हमपर जो बंदिशें लगाई हैं , हम उन्हें तोड़ेंगे और उन मदहोश जालिमों को सिखाएँगे कि आज़ादी के दीवाने के बढ़ते कदम अपनी मंजिल पर पहुंचे बिना कहीं रुकते नहीं हैं | मस्जिद की सभा विसर्जित हो गई | दीवानों का दल खुली सड़क पर पहुँच गया | गली और कूचों से निकल - निकलकर लोगों की धाराएं जनसागर में मिलने लगीं | ' भारत माता की जय ' के नारों से वातावरण गूँजने लगा | हीरामंडी चौक के चबूतरे के उस ओर खड़ा हुआ फौजी दस्ता बंदूकें संभालकर तैयार हो गया | फ़ौज के नेता नवाब मोहम्मद अली की ओर सबकी नज़रे उठ गई | खुशीराम को हीरामंडी चौक पर सभा करने वाले थे और फ़ौज के नेता नवाब मोहम्मद अली ने जुलुस खत्म करने के लिए चेतावनी देने लगे और बोला तुम में से कोई आगे बढ़ा तो हमारी बंदूको के मुहँ खुल जाएँगे | तिरंगे झंडे को और ऊँचा करते हुए खुशीराम ने गर्जना की – अगर आप मुझे रोक सके तो रोके मै आगे बढ़ता रहूँगा | इतने में एक गोली छुटी और उसकी छाती में समा गई | खुशीराम को सात गोलियाँ मारी गई; गोलियाँ उसके बढ़ते हुए कदम को रोक न सकी वो चबूतरे पर खड़े होकर नियत स्थान पर झंडा गाड़ ही दिया | आठवीं गोली मृत्यु का रूप धारण करके आई और खुशीराम के मस्तक को फोड़ती हुई आर – पार निकल गई | वीर धराशायी हो गया | COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan

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