Shaheed Kosh

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बहादुर शाह जफर का जन्म 24 अक्टूबर 1775 को हुआ था | बहादुरशाह ज़फर अंतिम मुग़ल शासक थे। वे अपने पिता अकबर द्वितीय की 28 सितंबर 1838 को मृत्यु होने के बाद उत्तराधिकारी बने। अपने नाम में वे ज़फर का उपयोग करते है जिसका अर्थ विजेता है। उन्होंने बहुत सी उर्दू कविताएं और ग़ज़ल लिखी है। वे केवल नाम मात्र के लिए ही शासक थे, एक मुग़ल शासक की तरह उनका नाम केवल इतिहास में लिखित हैं और उनके पास केवल दिल्ली (शाहजहाँबाद) पर शासन करने का ही अधिकार था। 1857 की क्रांति में उन्होंने भी भाग लिया था | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों की काफी सहायता की थी और इसीलिए उन्हें आधुनिक भारत के राष्ट्रिय सेनानी भी कहा जाता है। वे एक सशक्त शासक नही थे और उनका साम्राज्य भी समृद्ध और विकसित नही था। 1857 में जब हिंदुस्तान की आजादी की चिंगारी भड़की क्रांतिकारी सेना ने भारत के अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह जफ़र के सामने जाकर कहा - जहाँपनाह ! एक बार दिल्ली का तख्त फिर से कबूल करके हमारे बादशाह बनना स्वीकार कीजिये | बहादुर शाह ने उत्तर दिया- मेरे खजाने तो खाली हो चुके हैं . -आप लोगो को वेतन कहाँ से लाकर दूंगा ? देशभक्तों के स्वर गूंज उठे - हम भाड़े के सैनिक नही हैं | वेतन लेकर लड़ने वाले और होंगे | हम तो आज़ादी कि कीमत अपने सिरो से देने आपके झंडे के नीचे आए हैं | उन्होंने १८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया । अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला। भारतीयों ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी। क्रांतिकारी सेना ने बहादुर शाह जफ़र को दिल्ली के तख्त पर फिर से आसीन किया | क्रांति कि लपटे चारों और फैलने लगी | ऐसा लगा कि हिंदुस्तान से अंग्रेजों के बोरिए- बिस्तर उठने वाले हैं ; पर हमारी आपस कि फूट से उनके पैर लड़खड़ाकर फिर से जम गए | युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया | बहादुर शाह ज़फ़र सिर्फ एक देशभक्त मुग़ल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के प्रसिद्ध कवि भी थे। उन्होंने बहुत सी मशहूर उर्दू कविताएं लिखीं, जिनमें से काफ़ी अंग्रेजों के ख़िलाफ़ बगावत के समय मची उथल-पुथल के दौरान खो गई या नष्ट हो गई। उनके द्वारा उर्दू में लिखी गई पंक्तियां भी काफ़ी मशहूर हैं | हिन्दुस्तान से बाहर रंगून में भी उनकी उर्दू कविताओं का जलवा जारी रहा। वहां उन्हें हर वक्त हिंदुस्तान की फ़िक्र रही। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफनाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने सात नवंबर, 1862 को एक बंदी के रूप उनकी मृत्यु हुई | मुल्क से अंग्रेजों को भगाने का सपना लिए 7 नवंबर 1862 को उनका निधन हो गया। बहादुर शाह ज़फ़र की मृत्यु 86 वर्ष की अवस्था में बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में हुई थी। उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है। लोगों के दिल में उनके लिए कितना सम्मान था उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तान में जहां कई जगह सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है | जिस दिन बहादुरशाह ज़फ़र का निधन हुआ उसी दिन उनके दो बेटों और पोते को भी गिरफ़्तार करके गोली मार दी गई। इस प्रकार बादशाह बाबर ने जिस मुग़ल वंश की स्थापना भारत में की थी, उसका अंत हो गया। COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan www.superzindagi.in , http://www.gyanipandit.com/

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