Shaheed Kosh

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– भारत को आजादी दिलाने के लिए लाखों लोगों ने संघर्ष किए। अपनी जान की कुर्बानिया दी । अपने जीवन का एक-एक क्षण देश के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे ही स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे अजीत सिंह । २३ फ़रवरी, १८८१ को पराधीन भारत में जन्में महान क्रांतिकारी सरदार अजीतसिंह “ भारत की आजादी के लिए पुरे अड़तीस वर्षो तक विदेशों में एक स्थान से दुसरे स्थान भटकते रहे | सरदार अजीतसिंह शहीद भगत सिंह के सगे चाचा थे | महानता में दोनों एक-दुसरे से कम नहीं थे | इक्कीस वर्ष की आयु में यदि भगत सिंह ने असेंबली में बम धमाका किया था, तो इक्कीस वर्ष का युवक अजीत सिंह दिल्ली में एकत्र राजा-महाराजाओ को भड़काता फिरता था कि दिल्ली में होने वाले दरबार का बहिष्कार करो ओर भारत को आज़ाद करने के प्रयत्न करके अपने पुराने पापों को धो डालो | उनकी वाणी अंग्रेजी साम्राज्य के लिए लावा के समान सिद्ध हो रही थी | पंजाब के किसान सरदार अजीत सिंह के मुट्टी में थे | इसलिए तो ब्रिटिश हुकूमत उनकी बढ़ती हुई शक्ति और प्रभाव को देख कर काँप उठी और 1906 ई. में लाला लाजपत राय जी के साथ ही साथ उन्हें भी देश निकाले का दण्ड दिया गया था।विदेश में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। सरदार अजीत सिंह के परिवार की अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की लंबी कहानी है। इनके दादा अंग्रेजों के खिलाफ रणजीत सिंह की तरफ से लड़े। अंग्रेजो ने इनकी जमीन-जायदाद जब्त कर ली। परंतु 1857 में सहायता की एवज में वापस करने का वादा किया। इनके दादा ने अंग्रेजों की पेशकश ठुकरा दी। पिता ने आर्यसमाज आंदोलन को पंजाब में फैलाने में काफी मदद की। उसी परंपरा में सरदार अजित सिंह, स्वर्ण सिंह, किशन सिंह भगतसिंह के पिता थे। सरदार अजित सिंह ने सबसे पहले भारतीय समाज और उसकी समस्याओं से अपने को जोड़ा। उस समय देश मे अकाल था। वे बरेली, मध्य प्रदेश, गुजरात गए और अकाल राहत के कार्यों में अपने को झोंक दिया। किसानों को उन्होंने संगठित किया और अंग्रेजों के किसान विरोधी चरित्र का पर्दाफाश कर दिया। आंदोलन की चिंगारी ज्वाला बन गयी और पंजाब विद्रोह की आग में जलने लगा। अंग्रजों ने सरदार अजीत सिंह और लाला लाजपत राय को मांडले जेल में भेज दिया। परंतु जनआक्रोश के सामने उन्हें छोड़ना पड़ा। वापस आकर फिर से वे स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने लगे। और जब अंग्रेजों द्वारा उन्हें गिरफ्तार किए जाने के षडयंत्र की जानकारी मिली तो वे कराची से समुद्र के रास्ते विदेश चले गए। वहां से वे ईरान पहुंचे और ईरान में अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे संघर्ष से जुड़ गए। वहां से वे युरोप गए और निरंतर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष को संगठित करते रहे। कनाडा में कामागाटामारू और गदर पार्टी के आंदोलनों में उनका विशेष हाथ रहा। द्वितीय विश्व युद्ध में इटली के खिलाफ लड़ रहे 10000 भारतीय सिपाहियों को उन्होंने आजाद हिंद फौज में जोड़ लिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और सख्त कारावास का सजा दिया। जब उनका रिहाई हुआ तब स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा था। १५ अगस्त १९४७ का पावन दिवस आ गया | 15 अगस्त 1947 की रात उन्होंने जवाहरलाल नेहरू का भाषण सुना और अपने देशवासियों को स्वाधीन भारत की बधाईयाँ देकर लगभग पचास वर्षो तक निरंतर आजादी की लड़ाई लड़नेवाला महान योद्धा सरदार अजीत सिंह ठीक १५ अगस्त १९४७ को ‘जय हिंद’ के अंतिम घोष के साथ भारत के शहीदों को यह शुभ संदेश देने चला गया | यह ऐसा प्रतीत होता है की जैसे एक मिशन के लिए उनका जन्म हुआ था और मिशन पूरा होते ही उन्होंने प्राण त्याग दिए। COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan http://www.pravasiduniya.com/ajeet-singh-anil-joshi

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