Shaheed Kosh

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भीकाजी कामा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य केंद्र बिंदु और पहली महिला क्रन्तिकारी थी | भीकाजी कामा का जन्म 24 सितम्बर 1861 को एक बड़े पारसी परिवार में भीकाजी सोराब पटेल के नाम से बॉम्बे (मुम्बई में हुआ था | उनके पिता सोराबजी फरंजि पटेल और माता जैजीबाई सोराबजी पटेल शहर में काफी मशहूर थे | उनके पिता सोराबजी- पेशे से एक व्यापारी और पारसी समुदाय के नामी हस्तियों में से एक थे | भीकाजी ने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका का भ्रमण कर भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया था। वे जर्मनी के स्टटगार्ट नगर में 22 अगस्त 1907 में हुई सातवीं अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में तिरंगा फहराने के लिए विख्यात हुईं। उन्होंने अपनी शिक्षा एलेक्जेंड्रा नेटिव गल्र्स संस्थान में प्राप्त की थी और वह शुरू से ही तीव्र बुद्धि और संवेदनशील महिला थी । वे हमेशा ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी गतिविधियों में लगी रहती थी। वर्ष 1896 में मुम्बई में प्लेग फैलने के बाद भीकाजी ने मरीजों की सेवा की थी। बाद में वह खुद भी इस बीमारी की चपेट में आ गई थीं। इलाज के बाद वह ठीक हो गई थीं, लेकिन उन्हें आराम और आगे के इलाज के लिए यूरोप जाने की सलाह दी गई। वर्ष 1906 में उन्होंने लन्दन में रहना शुरू किया जहां उनकी मुलाक़ात प्रसिद्ध भारतीय क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा, हरदयाल और वीर सावरकर से हुई। लंदन में रहते हुए वह दादाभाई नैरोजी की निजी सचिव भी थीं। दादाभाई नैरोजी ब्रिटिश हाउस ऑफ़ कॉमन्स का चुनाव लड़ने वाले पहले एशियाई थे। जब वो हॉलैंड में थी, उस दौरान उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर क्रांतिकारी रचनाएं प्रकाशित करायी थी और उनको लोगों तक पहुंचाया भी। वे जब फ्रांस में थी तब ब्रिटिश सरकार ने उनको वापस बुलाने की मांग की थी पर फ्रांस की सरकार ने उस मांग को खारिज कर दिया था। इसके पश्चात ब्रिटिश सरकार ने उनकी भारतीय संपत्ति जब्त कर ली और भीखाजी कामा के भारत आने पर रोक लगा दी। उनके सहयोगी उन्हें भारतीय क्रांति की माता मानते थे, जबकि अंग्रेज उन्हें कुख्यात् महिला, खतरनाक क्रांतिकारी, अराजकतावादी क्रांतिकारी, ब्रिटिश विरोधी तथा असंगत कहते थे। उनके सम्मान में भारत में कई स्थानों और गलियों का नाम उनके नाम पर रखा गया है। 26 जनवरी 1962 में भारतीय डाक ने उनके समर्पण और योगदान के लिए उनके नाम का डाक टिकट जारी किया था। भारतीय तटरक्षक सेना में जहाजों का नाम भी उनके नाम पर रखा गया था। भारत की जिस आजादी के लिए मदाम कामा ने अपने जीवन और जवानी का एक-एक क्षण होम कर दिया, जिस समय वे भारत छोड़ी थी, उस समय वे युवती थी | अब सत्तर वर्ष की वृद्ध होकर वे स्वदेश लौट रही थी | उन्होंने भारत माता की स्वाधीनता के चिंतन और प्रयत्नों में ही व्यतीत किया था | भारत पहुँचकर मदाम कामा को अस्पताल में ही शरण लेनी पड़ी |देश की सेवा और स्वतंत्रता के लिए सब कुछ कुर्बान कर देने वाली इस महान महिला की लगभग आठ महीने पारसी जनरल अस्पताल मुम्बई में रहने के बाद १६ अगस्त १९३६ को मदाम कामा का देहावसान हो गया | मदाम कामा फाँसी या गोली लगने से शहीद नही हो पाई ; पर सत्य है कि उनकी मृत्यु किसी शहादत से कम नही हैं | Source- http://hindi.culturalindia.net/, http://www.gyanipandit.com/ , http://bharatdiscovery.org/

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