Shaheed Kosh

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- ठाकुर रोशन सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जनपद में फतेहगंज से १० किलोमीटर दूर स्थित गाँव नबादा में २२ जनवरी १८९२ को हुआ था । उनकी माता का नाम कौशल्या देवी और पिता का नाम ठाकुर जंगी सिंह था। ठाकुर रोशनसिंह में ठकुरास की ठसक थी | वे इरादों के पक्के और बात के धनी थे | जब उत्तर प्रदेश सरकार ने भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के वालंटियर कोर्प्स पर नवम्बर 1921 में बंदी लगा दी थी, तब देश के सभी कोनों से सरकार के इस निर्णय का विरोध किया जा रहा था। ठाकुर रोशन सिंह ने शाहजहांपुर जिले से बरेली भेजे जा रहे आक्रामक सेना वालंटियर्स का नेतृत्व किया था। पुलिस ने भी जुलुस को रोकने के लिए गोलियों का सहारा लिया था और इसके बाद रोशन सिंह और दुसरे जुलुसकर्ताओ को गिरफ्तार किया गया था। उनपर केस दर्ज कर उन्हें 2 साल तक बरेली के सेंट्रल जेल में कैद किया गया था। गाँव के ठाकुरों के नेता होने के कारण ठाकुर रोशनसिंह ‘असहयोग आंदोलन’ से अछूते कैसे रह सकते थे ! वे भी उसमे कूद पड़े, धरने दिए और डंडे खाए | जो व्यक्ति डंडा चलाने में माहिर हो, उसे डंडे खाना रास नहीं आया | असहयोग आन्दोलन में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली जिले के ग्रामीण क्षेत्र में आपने अद्भुत योगदान दिया था। यही नहीं, बरेली में हुए गोली-काण्ड में एक पुलिस वाले की रायफल छीनकर जबर्दस्त फायरिंग शुरू कर दी थी | जिसके कारण हमलावर पुलिस को उल्टे पाँव भागना पडा। मुकदमा चला और ठाकुर रोशन सिंह को सेण्ट्रल जेल बरेली में दो साल कैद की सजा काटनी पडी थी। चौरीचौरा की हिंसक घटना के कारण गाँधी जी ने ‘सत्याग्रह आंदोलन’ स्थगित कर दिया | इसके बाद उन्होंने हमेशा के लिए अहिंसावादी आंदोलन से अपना नाता तोड़ा तो उधर लगे हाथ वे सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन से अपना नाता जोड़ बैठे | ठाकुर रोशनसिंह रामप्रसाद बिस्मिल से बहुत प्रभावित थे | रामप्रसाद बिस्मिल के संपर्क में आकर उन्होंने डकैतियों के अपने शौक को तिलांजलि दे दी |असहयोग आन्दोलन के दौरान उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में हुए गोली-काण्ड में सजा काटकर जैसे ही शान्तिपूर्ण जीवन बिताने घर वापस आये कि हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन में शामिल हो गये। अब वे सशस्त्र क्रांतिकारी के रूप में रामप्रसाद बिस्मिल के दल में कार्य करने लगे | १९२२ की गया कांग्रेस में जब पार्टी दो फाड़ हो गई और मोतीलाल नेहरू एवम देशबन्धु चितरंजन दास ने अपनी अलग से स्वराज पार्टी बना ली। ये सभी लोग पैसे वाले थे जबकि क्रान्तिकारी पार्टी के पास संविधान, विचार-धारा व दृष्टि के साथ-साथ उत्साही नवयुवकों का बहुत बडा संगठन था। अगर कोई कमी थी तो वह कमी पैसे की थी। इस कमी को दूर करने के लिये आयरलैण्ड के क्रान्तिकारियों का रास्ता अपनाया गया और वह रास्ता था डकैती का। इस कार्य को पार्टी की ओर से ऐक्शन नाम दिया गया। ऐक्शन के नाम पर पहली डकैती पीलीभीत जिले के एक गाँव बमरौली में २५ दिसम्बर १९२४ को क्रिस्मस के दिन एक खण्डसारी (शक्कर के निर्माता) व सूदखोर (ब्याज पर रुपये उधार देने वाले) बल्देव प्रसाद के यहाँ डाली गयी। इस पहली डकैती में ४००० रुपये और कुछ सोने-चाँदी के जेवरात क्रान्तिकारियों के हाथ लगे। परन्तु मोहनलाल पहलवान नाम का एक आदमी, जिसने डकैतों को ललकारा था, ठाकुर रोशन सिंह की रायफल से निकली एक ही गोली में ढेर हो गया। सिर्फ मोहनलाल की मौत ही ठाकुर रोशन सिंह की फाँसी की सजा का कारण बनी। काकोरी कांड में ठाकुर रोशनसिंह सम्मिलित नही थे , फिर भी रामप्रसाद बिस्मिल के दल में क्रांतिकारी होने के नाते गिरफ्तार कर लिए गए | जब ‘काकोरी षड्यंत कांड’ के मुक़दमे का फैसला ६ अप्रैल, १९२७ को सेशन जज मि. हेमिल्टन ने लखनऊ के ‘रिंग थिएटर’ में सुनाया | एक धारा में उन्हें पाँच वर्ष के कारावास की सजा सुनाई और एक अन्य धारा में फाँसी कि सजा सुनाई गई |इलाहाबाद स्थित मलाका जेल की काल-कोठरी से ठाकुर रोशन सिंह ने अपने भाई हुकुम सिंह को पत्र लिखा था। जिसमे लिखा था,c"इस सप्ताह के भीतर ही फाँसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह आपको मोहब्बत का बदला दे। आप मेरे लिये रंज हरगिज न करें। मेरी मौत खुशी का बाइस (कारण) होगी। दुनिया में पैदा होकर मरना जरूर है। दुनिया में बद फैली करके अपने को बदनाम न करे और मरते वक्त ईश्वर की याद रहे; यही दो बातें होनी चाहिये और ईश्वर की कृपा से मेरे साथ ये दोनों बातें हैं। इसलिये मेरी मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है। दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूँ। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिन्दगी जीने के लिये जा रहा हूँ। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों की।" पत्र समाप्त करने के पश्चात उसके अन्त में उन्होंने अपना यह शेर भी लिखा था: जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन ! वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं। फाँसी से पहली रात ठाकुर साहब कुछ घण्टे सोये फिर देर रात से ही ईश्वर-भजन करते रहे। प्रात:काल शौचादि से निवृत्त हो यथानियम स्नान ध्यान किया कुछ देर गीता-पाठ में लगायी फिर पहरेदार से कहा-"चलो।" वह हैरत से देखने लगा यह कोई आदमी है या देवता! ठाकुर साहब ने अपनी काल-कोठरी को प्रणाम किया और गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फाँसी घर की ओर चल दिये। फाँसी के फन्दे को चूमा फिर जोर से तीन वार वन्दे मातरम् का उद्घोष किया और वेद-मन्त्र - "ओ३म् विश्वानि देव सवितुर दुरितानि परासुव यद भद्रम तन्नासुव" - का जाप करते हुए फन्दे से झूल गये। Source-, http://www.gyanipandit.com/, http://hindi.webdunia.com/

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