Shaheed Kosh

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भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के जनक, स्वराज्य की माँग रखने वाले बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को रत्नागिरि जिले के चिकल गाँव तालुका में हुआ था। इनके पिता का नाम गंगाधर रामचन्द्र पंत व माता का नाम पार्वती बाई गंगाधर था। इनका बाल्यकाल रत्नागिरि में व्यतीत हुआ। बचपन में इन्हें कहानी सुनने का बहुत शौक था इसलिये जब भी समय मिलता ये अपने दादाजी के पास चले जाते और उनसे कहानी सुनते। दादाजी इन्हें रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, गुरु नानक, नानक साहब आदि देशभक्तों और क्रान्तिकारियों की कहानी सुनाते थे। तिलक बड़े ध्यान से उनकी कहानियों को सुनकर प्रेरणा लेते। इन्हें अपने दादाजी से ही बहुत छोटी सी उम्र में भारतीय संस्कृति और सभ्यता की सीख मिली। इस तरह प्रारम्भ में ही इनके विचारों का रुख क्रान्तिकारी हो गया और ये अंग्रेजों व अंग्रेजी शासन से घृणा करने लगे। 1866 में गंगाधर रामचन्द्र पंत (तिलक के पिता) का तबादला पूना हो जाने के कारण तिलक परिवार के साथ पूना आ गये। इस समय इनकी उम्र 10 वर्ष की थी। पूना में इन्हें आगे की पढ़ाई के लिये एंग्लों वर्नाक्यूलर स्कूल में भर्ती कराया। यहाँ आने के बाद गंगाधर तिलक का एक नया ही रुप समाने आया। 1866 में पूना स्कूल में पढ़ते हुये तिलक ने 2 सालों में 3 श्रेणियों को पूरा किया था। पूना के स्कूल में पढ़ते समय तिलक के व्यक्तित्व का एक नया ही रुप सामने आया। इनके विद्यार्थी जीवन की ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जिन्होंने बचपन में ही ये स्पष्ट कर दिया था कि ये बालक न तो कभी अपने ऊपर हो रहे अन्याय सहेगा और न ही किसी और के ऊपर हो रहे अन्याय को चुपचाप देखेगा। इन घटनाओं ने तिलक को न्यायप्रियता, निर्भीक, जिद्दी स्वभाव, सत्यवादिता और अपने उसूलों पर कायम रहने वाला सिद्ध कर दिया। 14 वर्ष की छोटी सी उम्र में ही इनकी अंग्रेजी और संस्कृत पर अच्छी पकड़ थी। इनके पिता संस्कृत में इनके कविता लिखने की शैली के साथ ही अंग्रेजी, संस्कृत, मराठी और हिन्दी भाषा के इनके ज्ञान को देखकर खुद बहुत आश्चर्यचकित थे। तिलक ने मराठी में मराठा दर्पण व केसरी नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किये जो जनता में बहुत लोकप्रिय हुए। तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। इन्होंने माँग की कि ब्रिटिश सरकार तुरन्त भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया। तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए लेकिन जल्द ही वे कांग्रेस के नरमपंथी रवैये के विरुद्ध बोलने लगे। १९०७ में कांग्रेस गरम दल और नरम दल में विभाजित हो गयी। गरम दल में तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल शामिल थे। इन तीनों को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाने लगा। १९०८ में तिलक ने क्रान्तिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन किया जिसकी वजह से उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) स्थित मांडले की जेल भेज दिया गया। जेल से छूटकर वे फिर कांग्रेस में शामिल हो गये और १९१६ में एनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ अखिल भारतीय होम रूल लीग की स्थापना की। तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से 1890 में जुड़े। हालांकि, उसकी मध्य अभिवृत्ति, खासकर जो स्वराज्य हेतु लड़ाई के प्रति थी, वे उसके ख़िलाफ़ थे। वे अपने समय के सबसे प्रख्यात आमूल परिवर्तनवादियों में से एक थे। जल्दी शादी करने के व्यक्तिगत रूप से विरोधी होने के बावजूद, तिलक 1891 एज ऑफ़ कंसेन्ट विधेयक के खिलाफ थे, क्योंकि वे उसे हिन्दू धर्म में दख़लअन्दाज़ी और एक ख़तरनाक नज़ीर के रूप में देख रहे थे। इस अधिनियम ने लड़की के विवाह करने की न्यूनतम आयु को 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दिया था। बाल गंगाधर तिलक भारत के एक प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी थे। ये भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता थे। इन्होंने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वराज की माँग उठाई। इनका कथन "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" बहुत प्रसिद्ध हुआ। इन्हें आदर से "लोकमान्य" पूरे संसार में कहा जाता हैं । इन्हें हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है। तिलक ने भारतीय समाज में कई सुधार लाने के प्रयत्न किए। वे बाल-विवाह के विरुद्ध थे। उन्होंने हिन्दी को सम्पूर्ण भारत की भाषा बनाने पर ज़ोर दिया। महाराष्ट्र में उन्होंने सार्वजनिक गणेश पूजा की परम्परा प्रारम्भ की ताकि लोगों तक स्वराज का सन्देश पहुँचाने के लिए एक मंच उपलब्ध हो। भारतीय संस्कृति, परम्परा और इतिहास पर लिखे उनके लेखों से भारत के लोगों में स्वाभिमान की भावना जागृत हुई। लोकमान्य बाल गंगधर तिलक ने लीग के उद्देश्यों को स्पष्ट करने के लिये लगभग 100 से भी ज्यादा सभाओं का आयोजन किया। 1919 में जलियावाला बाग हत्या कांड की इन्होंने अपने लेखों के माध्यम से आलोचना की और बहिष्कार के आन्दोलन को जारी रखने की अपील की। इन्होंने इस सन्दर्भ में सांगली, हैदराबाद, कराँची, सोलापुर, काशी आदि स्थानों पर भाषण भी दिये। 1920 तक आते-आते ये काफी कमजोर हो गये थे। 1 अगस्त 1920 को स्वाधीनता के इस महान पुजारी ने इस संसार से अन्तिम विदा ली। Source-, http://hindi.webdunia.com/ , http://www.gyanipandit.com/, http://www.mahashakti.org.in/

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