Shaheed Kosh

इनके व्यक्तित्व के बारे में कोई भी तथ्य छूट गया हो या कोई तथ्य त्रुटिपूर्ण तो कृपया ज़रूर बतायें

अजीमुल्ला खां का जन्म सन 1820 में कानपुर शहर से सटी अंग्रेज़ी छावनी के परेड मैदान के समीप पटकापुर में हुआ था। उनके पिता नजीब मिस्त्री बड़ी मेहनत और परिश्रम करने वाले इंसान थे। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और परिवार गरीबी का जीवन व्यतीत कर रहा था। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ की माँ का नाम करीमन था। सैन्य छावनी व परेड मैदान से एकदम नजदीक होने के कारण अज़ीमुल्लाह ख़ाँ का परिवार अंग्रेज़ सैनिकों द्वारा हिन्दुस्तानियों के प्रति किए जाने वाले दुर्व्यवहारों का चश्मदीद गवाह और भुक्त भोगी भी था। एक बार एक अंग्रेज़ अधिकारी ने अज़ीमुल्लाह के पिता नजीब मिस्त्री को घोड़ों का अस्तबल साफ़ करने को कहा। उनके इंकार करने पर उसने नजीब को छत से नीचे गिरा दिया और फिर ऊपर से ईंट फेंककर मारी। इसके परिणाम स्वरूप नजीब छ: माह बिस्तर पर पड़े रहे और फिर अंत में उनका स्वर्गवास हो गया। अब माँ करीमन और बालक अज़ीमुल्लाह ख़ाँ बेसहारा होकर भयंकर गरीबी का जीवन जीने के लिए मजबूर हो गये। करीमन बेगम बहुत परिश्रम से अपना और बेटे का पालन-पोषण कर रही थीं। अत्यधिक परिश्रम करने से वे भी बीमार रहने लगीं। अब आठ वर्ष के बालक अज़ीमुल्लाह ख़ाँ के लिए दुसरों के यहाँ जाकर काम करना एक मजबूरी बन गई। उनके एक पड़ोसी मानिक चंद ने बालक अज़ीमुल्लाह ख़ाँ को एक अंग्रेज़ अधिकारी हीलर्सडन के घर की सफाई का काम दिलवा दिया। इसके दो वर्ष बाद ही उनकी माँ का भी इन्तकाल हो गया | अब अज़ीमुल्लाह ख़ाँ अंग्रेज़ अधिकारी हीलर्सडन के यहाँ रहने लगे। हीलर्सडन और उनकी पत्नी सहृदय लोग थे। उनके यहाँ अज़ीमुल्लाह ख़ाँ नौकर की तरह नहीं बल्कि परिवार के एक सदस्य के रूप में रह रहे थे। घर का काम करते हुए उन्होंने हीलर्सडन के बच्चों के साथ अंग्रेज़ी और फ्रेंच भाषा भी सीख ली। इसके बाद हीलर्सडन की मदद से उन्होंने स्कूल में दाखिला भी ले लिया। स्कूल की पढ़ाई समाप्त होने के पश्चात हीलर्सडन की सिफारिश से उसी स्कूल में उन्हें अध्यापक की नौकरी भी मिल गयी। स्कूल में अध्यापकों के साथ अज़ीमुल्लाह ख़ाँ मौलवी निसार अहमद और पंडित गजानन मिश्र से उर्दू, फ़ारसी, हिन्दी और संस्कृत भी सीखने में लगे रहे। इसी के साथ अब वे देश की राजनितिक, आर्थिक तथा धार्मिक, सामाजिक स्थितियों में तथा देश के इतिहास में भी रुचि लेने लगे। उसके विषय में अधिकाधिक जानकारियाँ लेने और उसका अध्ययन करने में जुट गये। इसके फलस्वरूप अब अज़ीमुल्लाह ख़ाँ कानपुर में उस समय के विद्वान समाज का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गये। उनकी प्रसिद्धि एक ऐसे विद्वान के रूप में होने लगी, जो अंग्रेज़ी रंग में रंगा होने के वावजूद अंग्रेज़ी हुकूमत का हिमायती नहीं था। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ की यह प्रसिद्धि कानपुर के समीप बिठूर रह रहे नाना साहब तक भी पहुँच गई। अंग्रेज़ गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी की हुकूमत ने बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र होने के नाते नाना साहब की आठ लाख रुपये की वार्षिक पेंशन बंद कर दी थी। उन्होंने अज़ीमुल्लाह ख़ाँ को अपने यहाँ बुलाया और अपना प्रधान सलाहकार नियुक्त कर दिया। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ ने वहाँ रहकर घुडसवारी, तलवारबाजी एवं युद्ध कला भी सीखी। बाद के समय में अज़ीमुल्लाह ख़ाँ नाना साहब की पेंशन की अर्जी लेकर इंग्लैण्ड गये। इंग्लैण्ड में उनकी मुलाक़ात सतारा राज्य के प्रतिनिधि रंगोली बापू से हुई। रंगोली बापू सतारा के राजा के राज्य का दावा पेश करने के लिए लंदन गये हुए थे। सतारा के राजा के दावे को 'ईस्ट इंडिया कम्पनी' के 'बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर' ने खारिज कर दिया। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ को भी अपने पेंशन के दावे का अंदाजा पहले ही हो गया। अंतत: वही हुआ भी। बताया जाता है की रंगोली बापू के साथ बातचीत में अज़ीमुल्लाह ख़ाँ ने इन हालातों में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह की अनिवार्यता को जाहिर किया था। फिर इसी निश्चय के साथ दोनों भारत वापस लौटे। भारत पहुँचने से पहले यूरोप के देशों में घूमकर वह राजनीति का व्याहारिक अध्ययन कर लेना चाहते थे; इस उद्देश्य से वह माल्टा जा पहुँचे और वहां देखा की क्रीमिया के युद्ध में रूस के मुकाबले इंग्लैंड और फ्रांस की संयुक्त फौज हार गई है | ब्रिटिश वीरता का खोखलापन उसके सामने प्रकट हो गया | वह सोचने लगे अगर भारत की देशी रियासते संयुक्त होकर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजा दे तो अंग्रेजों को भगाया जा सकता है | इस घटना ने उनके मन में क्रांति और आशावाद का संदेश दिया | १८५७ की सैनिक क्रांति की संरचना में अजीमुल्ला खां का ही प्रमुख हाथ था | उन दिनों रूस व इंग्लैण्ड में युद्ध जारी था। यह भी कहा जाता है कि अज़ीमुल्लाह ख़ाँ ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध रूसियों से मदद लेने का भी प्रयास किया था। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ के भारत लौटने के बाद ही 1857 ई. के संग्राम की तैयारी में तेज़ी आ गई। अज़ीमुल्लाह ख़ाँ के राष्ट्र प्रेम और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भी इतिहास रहा है। उनकी मृत्यु के बारे में यह माना जाता है कि अज़ीमुल्लाह ख़ाँ अंग्रेज़ी सेना के विरुद्ध लड़ते हुए कानपुर के पास अहिराना नामक स्थान पर मारे गये। एक कथन यह भी है कि नाना साहब की हार और फिर नेपाल जाने के साथ अज़ीमुल्लाह ख़ाँ भी नेपाल पहुँच गये थे। वहाँ वर्ष 1859 के अन्त में यानी 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan http://www.gyanipandit.com/ , http://hindi.culturalindia.net/

General Administration Department
Goverment of NCT of Delhi