Shaheed Kosh

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लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब राज्य के फिरोजपुर जिले के धुड़ीके गाँव में हुआ था। इनका जन्म अपने ननिहाल में हुआ था। लाला लाजपत राय का पैतृक गाँव जगराव जिला लुधियाना था | लाला लाजपत राय बाल्यअवस्था में अच्छे स्वास्थ्य वाले नहीं थे, क्योंकि इनका जन्म स्थान एक मलेरिया ग्रस्त क्षेत्र था। बचपन में ये बहुत ही अस्वस्थ और अक्सर मलेरिया से पीड़ित रहते थे । लाला लाजपत राय की प्रारम्भिक शिक्षा रोपड़ के स्कूल में हुई। कुरान, शाहनामा व इतिहास की अन्य पुस्तकों को पढ़ने में संलग्न होने और मलेरिया से पीड़ित होने पर भी ये अपनी पाठ्य पुस्तकों को बहुत रुचि के साथ पढ़ते थे। इन्होंने कभी भी अपने पाठ्य क्रम को भंग नहीं होने दिया। ये पूरे स्कूल में सबसे कम आयु के थे और हमेशा अपनी क्लास में पहले स्थान पर रहते थे। इनके पिता राधाकृष्ण इन्हें घर पर भी शिक्षा दिया करते थे जिससे इनकी स्कूली शिक्षा में सहायता मिलती थी। लाजपत राय शुरु से ही मेधावी छात्र थे और अपने पिता की ही तरह अपनी क्लास में सबसे पहले स्थान पर आते थे। इनके पिता ने इन्हें गणित, भौतिक विज्ञान के साथ ही इतिहास तथा धर्म की भी शिक्षा दी। रोपड़ स्कूल 6 क्लास तक ही था। यहाँ से शिक्षा पूरी करने के पश्चात इन्हें आगे की पढ़ाई के लिये लाहौर भेज दिया गया। शिक्षा विभाग की ओर से इन्हें सात रुपये मासिक की छात्रवृति दी गयी तो ये लाहौर से दिल्ली आ गये। इन्होंने दिल्ली में रहकर 3 महीने तक अध्ययन किया पर यहाँ की जलवायु इनके स्वास्थ्य के अनुकूल नही थी जिस कारण ये बीमार हो गये और अपनी माता के साथ अपने गाँव जगराव आ गये। दिल्ली छोड़ने के बाद इन्होंने मिशन हाई स्कूल लुधियाना में प्रवेश लिया और मेधावी छात्र होने के कारण यहाँ भी इन्हें छात्रवृति प्राप्त हुई। वर्ष 1877-78 में लाजपत ने मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की, इसी वर्ष इनका विवाह राधा देवी से हुआ। यही से ही इन्होंने मैट्रीकुलेशन की भी परीक्षा उत्तीर्ण की। बीमारी ने इनका पीछा यहाँ भी नहीं छोड़ा, फलस्वरुप कुछ समय बाद ही इन्हें मजबूर होकर स्कूल छोड़ना पड़ा। इसी समय इनके पिता का स्थानान्तरण शिमला से अम्बाला हो गया और इनका पूरा परिवार वहीं पहुँच गया। लाला लाजपत राय का परिवार अधिक सम्पन्न नहीं था। इनके पिता के सामने इनकी उच्च शिक्षा को पूरा कराने की चुनौती थी। इनकी उच्च शिक्षा को पूर्ण करने के लिये इनके पिता ने अपने मित्र सजावल बलोच से मदद माँगी। बलोच साहब एक कट्टर मुस्लिम सज्जन थे और राधाकृष्ण के घनिष्ट मित्र थे। इन्होंने लाजपत की शिक्षा के लिये आर्थिक सहायता देने का वचन दिया। 1880 में लाला लाजपत राय ने कलकत्ता विश्वविद्यालय तथा पंजाब विश्वविद्यालय दोनों से डिप्लोमा की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वे 1881 में 16 वर्ष की आयु में लाहौर आ गये और लाहौर के एकमात्र स्कूल गवर्नमेंट यूनिवर्सिटी लाहौर में प्रवेश लिया। ये अपनी पढ़ाई का ज्यादातर खर्चा छात्रवृति से ही पूरा कर लेते थे बस कभी-कभी अपने पिता से 8 या 10 रुपये मासिक लेते थे। ये अपना अध्ययन अपने सहपाठियों से पाठ्यक्रम की किताबों को लेकर करते थे। इतने अभाव का जीवन व्यतीत करते हुए भी इन्होंने 1882-83 में एफ.ए. (इंटरमिडियेट) की परीक्षा के साथ ही मुख्तारी की परीक्षा भी सफलता पूर्वक उत्तीर्ण की। लाला लाजपत राय ने वर्ष 1889 में वकालत की पढाई के लिए लाहौर के सरकारी विद्यालय में दाखिला लिया। कॉलेज के दौरान वह लाला हंसराज और पंडित गुरुदत्त जैसे देशभक्तों और भविष्य के स्वतंत्रता सेनानियों के संपर्क में आये। तीनों अच्छे दोस्त बन गए और स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज में शामिल हो गए। उन्होंने सरकारी कॉलेज से द्वितीय श्रेणी में वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की और हिसार में अपनी वकालत शुरू कर दी। वकालत के अलावा लालाजी ने दयानन्द कॉलेज के लिए धन एकत्र किया, आर्य समाज के कार्यों और कांग्रेस की गतिविधियों में भाग लिया। वह हिसार नगर पालिका के सदस्य और सचिव चुने गए। वह 1892 में लाहौर चले गए | लाला लाजपत राय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन प्रमुख हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं में से एक थे। वह लाल-बाल-पाल की तिकड़ी का हिस्सा थे। बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चन्द्र पाल इस तिकड़ी के दूसरे दो सदस्य थे। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नरम दल (जिसका नेतृत्व पहले गोपाल कृष्ण गोखले ने किया) का विरोध करने के लिए गरम दल का गठन किया। लालाजी ने बंगाल के विभाजन के खिलाफ हो रहे आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्होंने सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी, बिपिन चंद्र पाल और अरविन्द घोष के साथ मिलकर स्वदेशी के सशक्त अभियान के लिए बंगाल और देश के दूसरे हिस्से में लोगों को एकजुट किया। लाला लाजपत राय को 3 मई 1907 को रावलपिंडी में अशांति पैदा करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और मांडले जेल में छः महीने रखने के बाद 11 नवम्बर 1907 को रिहा कर दिया गया। स्वतंत्रता संग्राम ने एक क्रन्तिकारी मोड़ ले लिया था इसलिए लालाजी चाहते थे की भारत की वास्तविक परिस्थिति का प्रचार दूसरे देशों में भी किया जाए । इस उद्देश्य से 1914 में वह ब्रिटेन गए। इसी समय प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया जिसके कारण वह भारत नहीं लौट पाये और फिर भारत के लिए समर्थन प्राप्त करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए। उन्होंने इंडियन होम लीग ऑफ़ अमेरिका की स्थापना की और “यंग इंडिया” नामक एक पुस्तक लिखी। पुस्तक के द्वारा उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन को लेकर गंभीर आरोप लगाये और इसलिए इसे ब्रिटेन और भारत में प्रकाशित होने से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया। 1920 में विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ही वह भारत लौट पाये। वापस लौटने के पश्चात लाला लाजपत राय ने जलियाँवाला बाग नरसंहार के खिलाफ पंजाब में विरोध प्रदर्शन और असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया। इस दौरान वो कई बार गिरफ्तार भी हुए। वह चौरी चौरा कांड के कारण असहयोग आंदोलन को बंद करने के गांधी जी के निर्णय से सहमत नहीं थे और उन्होंने कांग्रेस इंडिपेंडेंस पार्टी की स्थापना की। वर्ष 1928 में ब्रिटिश सरकार ने संवैधानिक सुधारों पर चर्चा के लिए साइमन कमीशन को भारत भेजने का फैसला किया। कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य न होने की वजह से सभी लोगों में निराशा, क्रोध व्याप्त था। 1929 में जब कमीशन भारत आया तो पूरे भारत में इसका विरोध किया गया। लाला लाजपत राय ने खुद साइमन कमीशन के खिलाफ एक जुलूस का नेतृत्व किया। हांलाकि जुलूस शांतिपूर्ण निकाला गया पर ब्रिटिश सरकार ने बेरहमी से जुलूस पर लाठी चार्ज करवाया। लाला लाजपत राय को सिर पर गंभीर चोटें आयीं और जिसके कारण 17 नवंबर 1928 में उनकी मृत्यु हो गई। Source- http://www.gyanipandit.com/ , http://suvicharhindi.com/ , http://www.bharatdarshan.co.nz/ , http://www.hindikiduniya.com/ ,

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