Shaheed Kosh

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हेमू कालाणी भारत के एक क्रान्तिकारी एवं स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे । हेमू कलानी सिंध प्रदेश का रहने वाला था | जब वे किशोर अवस्था में थे तब उन्होंने अपने साथियों के साथ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और लोगों से स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने का आग्रह किया. सन् १९४२ में जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया तो हेमू इसमें कूद पड़े । अपेक्षाकृत शांत रहने वाला हेमू कलानी ने अपना नाम कमा लिया | हेमू कलानी ने अपनी किशोरावस्था में ही फाँसी का फंदा चूमा | 1942 में 19 वर्षीय किशोर क्रांतिकारी ने “अंग्रेजो भारत छोड़ो ” नारे के साथ अपनी टोली के साथ सिंध प्रदेश में तहलका मचा दिया था और उसके उत्साह को देखकर प्रत्येक सिंधवासी में जोश आ गया था | हेमू समस्त विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार करने के लिए लोगो से अनुरोध किया करते थे | शीघ्र ही सक्रिय क्रान्तिकारी गतिविधियों में शामिल होकर उन्होंने हुकुमत को उखाड़ फेंकने के संकल्प के साथ राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रियाकलापों में भाग लेना शूरू कर दिया |अत्याचारी फिरंगी सरकार के खिलाफ छापामार गतिविधियों एवं उनके वाहनों को जलाने में हेमू सदा अपने साथियों का नेतृत्व करते थे | अंग्रेज सैनिकों की एक पल्टन ट्रेन द्वारा सक्खर से गुजर रही थी | उन्हें यह गुप्त जानकारी मिली कि अंग्रेजी सेना हथियारों से भरी रेलगाड़ी रोहड़ी शहर से होकर गुजरेगी | ये लोग भारत छोड़ो आंदोलन के आंदोलनकारियों को कुचलने के लिए ही जा रहे थे | नंद और किशन नाम के दो युवक हेमू कलानी का साथ देने के लिए तैयार हो गए | तीनों युवकों ने रेल कि पटरियाँ उखाड़ने का सामान जुटा लिया और रेल पटरियों उखाड़ने का काम करने लगे | हेमू कालाणी अपने साथियों के साथ रेल पटरी को अस्त व्यस्त करने की योजना बनाई | वे यह सब कार्य अत्यंत गुप्त तरीके से कर रहे थे पर फिर भी वहां पर तैनात पुलिस कर्मियों की नजर उनपर पड़ी और उन्होंने हेमू कालाणी को गिरफ्तार कर लिया और उनके बाकी साथी फरार हो गए | हेमू कलानी ने पटरियाँ उखाड़ने कि सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली | फौजी अदालत ने हेमू को फाँसी का दंड सुना दिया | फाँसी की खबर सुनकर हेमू कालाणी का वजन आठ पौंड बढ़ गया | नन्हे वीर हेमू की माँ ने अपने आंसुओ को रोकना चाहा लेकिन ममतामयी आँखों से आंसू छलक आये | ममता और निडरता का नजारा देख दुसरे अन्य कैदी रो दिए किन्तु हेमू की आँखों में एक अनोखी चमक थी | माँ की चरण वन्दना करते हुए हेमू ने कहा “माँ मेरा सपना पूरा हुआ , अब जननी भारत को आजाद होने से कोई नही रोक सकता | 21 जनवरी १९४३ को क्रांति के लिए वह नौजवान हँसते – हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गया और भारत की आजादी में शहीद होने वालो में एक नाम और जुड़ गया | संसद के प्रवेश द्वार पर अमर शहीद हेमू कालाणी की प्रतिमा देश की आहुति देने वाले भारत के सच्चे सपूत हेमू कालाणी के प्रति सच्ची श्रधांजलि है |भारत को स्वतंत्र कराने में देश के नन्हे क्रांतिकारी हेमू कालाणी का नाम गौरवान्वित एवं अजर अमर रहेगा | 18 अक्टूबर 1983 को देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एवं शेर-ए-सिंध शहीद हेमू कालाणी की माताजी जेठी बाई कालाणी की उपस्थिथि में नन्हे क्रांतिकारी हेमू कालाणी पर डाक टिकिट जारी किया गया था | गुलामी की जंजीरों में जकड़ी भारत माता को आजाद कराने में दो नन्हे क्रांतिकारियों को कभी नही भुलाया जा सकता है | ये दोनों नन्हे क्रांतिकारी थे खुदीराम बोस और हेमू कालाणी | COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan http://gajabkhabar.com/

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