Shaheed Kosh

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1918 में हकीम अजमल ख़ाँ कांग्रेस में सम्मिलित हो गए। हकीम साहब के राजनीति में प्रवेश करते ही उनका पुश्तैनी घर आज भी बल्लीमारान में शरीफ मंज़िल के नाम से प्रसिद्ध है, राजनीतिज्ञों का केंद्र बन गया। उन दिनों शरीफ मंज़िल में नेताओं के आने जाने से बहुत चहल पहल बनी रहती थी। हकीम साहब एक बड़े तख्त पर बैठ कर नेताओं से विचार विमर्श करते रहते थे। गुप्त बात के लिए आँगन में लगे हुए छोटे कमरे में बैठते थे। उस छोटे से कमरे में ना जाने कितनी समस्याओं का समाधान किया गया था, जिसमें आजकल सन्नाटा छाया रहता है। हकीम साहब की योजना के अनुसार 30 मार्च, 1919 ई. को दिल्ली में सबसे बड़ी हड़ताल हुई थी। इस हड़ताल को सफल बनाने के लिए उन्होंने बहुत दौड़-धूप की थी। उनके इस कार्य की बड़े-बड़े नेताओं ने दिल खोलकर प्रशंसा की थी। 1919 ई. के अन्तर में उनके प्रयत्नों से ही शहीदों का शानदार स्मारक बना, जिसकी देश के बड़े-बड़े नेताओं ने प्रशंसा की। 1921 में कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन की और ख़िलाफ़त कांग्रेस की अध्यक्षता की। ‘ऑल इण्डिया गो रक्षा कांफ़्रेंस’, जिसके अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे, स्वागत समिति की अध्यक्षता का दायित्व भी हकीम साहब ने ही उठाया था। उस सम्मेलन में मुसलमानों से अपील की गई थी कि, वे इस मामले में हिन्दुओं की भावनाओं का सम्मान करें। हकीम साहब ने 1918 ई. से लेकर 1927 तक स्वतंत्रता आन्दोलन की राजनीति में खुल कर भाग लिया था। हकीम साहब का गांधीजी से पहला सम्पर्क 1919 ई. में हुआ था। उस समय 1919 रोलेक्ट बिल के विरुद्ध सत्याग्रह चल रहा था। सत्याग्रह के सम्बन्ध में ही गांधीजी दिल्ली आए हुए थे। हकीम साहब सत्याग्रह के संबंध में बातचीत करने के लिए गांधीजी के पास पहुँचे और वे गांधीजी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। उसके बाद हकीम साहब का सम्पर्क गांधीजी से निरन्तर प्रगाढ़ होता चला गया । गांधीजी जब भी किसी साम्प्रदायिक समस्या को सुलझाना चाहते थे, तब वे इस सम्बन्ध में हकीम साहब से परामर्श करते थे। 1920 ई. में लॉर्ड हार्डी ने हकीम साहब को तिब्बिया कॉलेज की सहायता के लिए छ: लाख रुपये देने का वचन दिया था, परंतु 1921 ई. में जब हकीम साहब ने गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया, तो लॉर्ड हार्डी ने सहायता देने से मना कर दिया। हकीम साहब ने इसकी कोई परवाह नहीं की। वे जीवन के अंतिम समय तक देश की आज़ादी के लिए अंग्रेज़ों से संघर्ष करते रहे। उनका तिब्बिया कॉलेज आज भी उन्हीं की भांति सर ऊँचा किए हुए खड़ा है, अपनी सेवाओं से उस महान देशभक्त की स्मृति को ताजा कर देता है। 1927 ई. में यह महापुरुष परलोक सिधार गया था। 9 वर्षों के थोड़े से समय में उन्होंने ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य किए, जिसके कारण उन्हें युगों-युगों तक याद किया जाता रहेगा। Source- http://bharatdiscovery.org/ http://hindi.culturalindia.net/

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