Shaheed Kosh

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यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का जन्म २२ फ़रवरी को चटगांव (अब बांग्लादेश में) के विख्यात सेनगुप्ता परिवार में हुआ था वे भारत एक महान क्रान्तिकारी थे | जिन्होने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। ब्रितानी पुलिस ने उन्हें अनेकों बार गिरफ्तार किया। उन्होंने 1909 ई. में इंग्लैंड से अपनी बैरिस्टरी पूर्ण की थी। उन्होंने अपना जीवन एक वकील के रूप में कोलकाता उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की और साथ ही मज़दूरों के हित के लिए सदैव कार्य करते रहे। इन्होंने एक अंग्रेज़ युवती नेली सेनगुप्त से विवाह किया था | जिसने देश को स्वाधीन कराने कि लिए अपने पति के समान ही जेल की सजाएँ भोगीं। यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त को पाँच बार कोलकाता का मेयर चुना गया था। किन्तु बाद में वे इसे त्यागकर असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े। वे मज़दूर हित समर्थक थे तथा असम-बंगाल रेलवे की हड़ताल का संयोजन किया। 1921 में सिलहट में चाय बाग़ानों के मज़दूरों के शोषण के विरुद्ध यतीन्द्र मोहन के प्रयत्न से बाग़ानों के साथ-साथ रेलवे और जहाज़ों में भी हड़ताल हो गई थी। इस पर उन्हें गिररफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया। स्वराज पार्टी बनने पर यतीन्द्र उसकी ओर से बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए। 1925 में उन्होंने कोलकाता के मेयर का पद सम्भाला। अपने जनहित के कार्यों से वे इतने लोकप्रिय बन गये थे कि उन्हें पांच बार कोलकाता का मेयर चुना गया। पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए 1928 के कोलकाता अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त ही थे। रंगून (अब यांगून) में उन्होंने बर्मा (अब म्यांमार) को भारत से अलग करने के सरकारी प्रस्ताव के विरोध में एक भाषण दिया तो राजद्रोह का आरोप लगाकर वे फिर से गिरफ़्तार कर लिये गए। 1930 में कांग्रेस को सरकार ने गैर-क़ानूनी घोषित कर दिया। यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष चुने गए। लेकिन सरकार ने उन्हें पहले ही उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। उनकी पत्नी नेली सेनगुप्त भी गिरफ़्तार की गईं। 1931 में उनका नाम पुन: अध्यक्ष पद के लिए लिया गया था, किन्तु उन्होंने सरदार पटेल के पक्ष में कराची कांग्रेस की अध्यक्षता से अपना नाम वापस ले लिया। 1931 में वे स्वास्थ्य सुधार के लिए विदेश गए, लेकिन 1932 में स्वदेश लौटते ही पुन: गिरफ़्तार कर लिये गए | इसके बाद वे बंगाल प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय नेतृत्व किया। वे 1931 ई. में प्रथम गोलमेज सम्मेलन प्रारंभ होने पर इंग्लैण्ड गए थे। वे जनवरी, 1932 ई. में बन्दी बना लिये गए तथा उन्हें पूना, दार्जिलिंग व राँची में कैद रखा गया। उनकी 1933 ई. में 48 वर्ष की अल्पायु में मृत्यु हो गई। उन्होंने जीवनभर राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। वे ‘देशप्रिय’ उपनाम से विख्यात हैं। 1933 में कोलकाता में कांग्रेस का अधिवेशन प्रस्तावित था, जिसकी अध्यक्षता महामना मदन मोहन मालवीय जी को करनी थी, लेकिन अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें मार्ग में ही गिरफ़्तार कर लिया और कोलकाता जाने से रोक दिया। इसके बाद पुलिस के सारे बन्धनों को तोड़ते हुए श्रीमती नेल्ली सेनगुप्त ने इस अधिवेशन की अध्यक्षता की। परन्तु वे अपने भाषण के कुछ शब्द ही बोल पाई थीं कि उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया। यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त को अस्वस्थ अवस्था में ही जेल में बन्द रखा गया था। 22 जुलाई, 1933 को रांची में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु जेल के अन्दर ही (राँची में) हुई। उनकी पत्नी नेली सेनगुप्त, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं। Source- http://bharatdiscovery.org/ , , hi.wikipedia.org

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