Shaheed Kosh

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जनरल शाहनवाज खान का जन्म 24 जनवरी 1914 को हुआ था | वे आजाद हिन्द फौज के प्रसिद्ध अधिकारी थे। जंग ए आजादी का वो जांबाज सिपाही जिसने दुसरे विश्व युद्ध में जाने से पहले शहीद बहादुर शाह जफ़र के कब्र पे कसम खायी थी , सिंगापूर से मेरा सेनापति मेरी लाश लायेगा और मुझे दिल्ली दफ्न करेगा जिसने आज़ाद भारत में सबसे पहले लालकिले से ब्रिटिश हुकूमत के झंडे को उतार फेंका और उसपे अपना तिरंगा फहरा दिया। मेजर जनरल शाहनवाज खां सुभाष चन्द्र बोस के बहुत ही करीबी थे | 1947 में जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ और हिंदुस्तान से अधिकांश मुस्लमान पाकिस्तान जा रहे थे तब एक ऐसा देशभक्त भी था जो पाकिस्तान छोडकर अपने पुरे परिवार के साथ हिंदुस्तान आ गया।शाहनवाज खान का जन्म ब्रिटिश इंडिया में 24 जनवरी 1914 को गाँव मटौर जिला रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में झंझुआ राजपूत कैप्टन सरदार टिका खान के घर हुआ।उनकी शुरूआती पढाई पाकिस्तान में ही हुयीऔर आगे की पढाई प्रिंस ऑफ़ वेल्स रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज देहरादून में हुयी और 1940 में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक अधिकारी के पद पर ज्वाइन कर लिया।चूँकि शाहनवाज खान के घर वाले भी सेना में थे इसलिए देशभक्ति और सैन्य सूझ बुझ उन्हें विरासत में मिली थी । द्रितीय विश्व युद्ध में उन्हें उनके सैकड़ो सैनिक साथियों के साथ सिंगापुर में गिरफ्तार कर लिया गया।1943 में जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सिंगापुर आये तो उनके कोशिशों से सारे कैदियों को रिहा करवाया गया और नेताजी से प्रभावित होकर शाहनवाज खान ने आज़ाद हिन्द फ़ौज ज्वाइन कर ली ।फिर वो जंग ए आज़ादी में और भी खुल के सामने आ गए। उनके वतनपरस्ती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की उन्हें आज़ाद हिन्द फ़ौज में रहते हुए 1944 में कुछ सैनिको को छांटकर सुभाष ब्रिगेड बनाया गया जिसका कमांड शाहनवाज शाहब को बनाया गया, रंगून (वर्तमान बर्मा) में उन्होंने अंग्रेजों से लड़ते हुए उनकी इंट से इंट बजा दी थी।1945 में अंग्रेजों से लड़ते हुए उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और उनपे प्रसिद्ध लाल किला कोर्ट में मार्शल हुआ तब पुरे देश के सामने 90 साल पुराना बहादुर शाह जफ़र के साथ किया गया अंग्रेजों के जुल्म का मंजर घुम गया और पूरा देश शाहनवाज खान के साथ उठ खड़ा हुआ। फिर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने अपनी वकालत की गाउन एक बार फिर पहनी और उतर गए शाहनवाज साहब का केस लड़ने।पुरे देश का जन दबाव और विद्रोह होने के डर से अंग्रेजों ने उन्हें हल्के अर्थदंड पर रिहा कर दिया।शाहनवाज खान हिंदुओं से भी उतनी ही मुहब्बत करते जितनी मुसलमानों से, इसका जीता जगता सबूत है उत्तर प्रदेश(वर्तमान उत्तराखंड) के हरिद्वार जिले का सुभाषगढ़ गाँव जिसे शाहनवाज खान ने खुद पाकिस्तान से आये हुए अपने हिन्दू सैनिक साथियों ( जो रिफ्यूजी कैंप में रह कर गुजारा) कर रहे थे उनके लिए जवाहर लाल नेहरु को पत्र लिखकर उनके लिए बेहतर इंतजाम की दर्ख्वाश्त की जिसे नेहरु ने मानते हुए 1952 में सुभाष गढ़ के गाँव के नाम से मान्यता दे दी। आज़ाद हिन्द फ़ौज भंग होने के बाद शाहनवाज साहब ने कांग्रेस ज्वाइन कर लिया और 1952 से 1972 तक मेरठ से सांसद रहे | कांग्रेस में रहते हुए लगातार 23 सालों तक अनेक ऊँचे पदों पर रहे और अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहे, आखिर अंग्रेजों और खुद से जंग करते करते 9 दिसम्बर 1983 के दिन को उन्होंने सबसे नाता तोड़ लिया और इस दुनिया को अलविदा कह दिया उनकी मृत्यु के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उनके घर फोन किया और उन्हें दिल्ली में दफ्न करने की गुजारिश की। उनका जनाजा दिल्ली लाया गया और जामा मस्जिद के पास एक अज़ीम स्वतंत्रा सेनानी को उसके तमाम खुबियों और इतिहासों के साथ दफ्न कर दिया गया | COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan http://teesrijungnews.com/

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