Shaheed Kosh

इनके व्यक्तित्व के बारे में कोई भी तथ्य छूट गया हो या कोई तथ्य त्रुटिपूर्ण तो कृपया ज़रूर बतायें

- पंडित मदनमोहन मालवीय का जन्म 26 दिसम्बर 1861 को इलाहाबाद में हुआ था | इनके पिता बृजनाथ मालवीय ने इनकी प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था ‘धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला’ में करायी. इसके बाद इन्हें ‘विद्धाधर्म प्रवाधिर्नी’ में प्रवेश दिलाया गया | पंडित मदनमोहन मालवीय अत्यंत मेधावी छात्र थे | अतः इन्हें शिक्षकों का भरपूर स्नेह मिला | इसी विद्यालय के शिक्षक देवकीनंदन जी ने मालवीय के व्यक्तित्व को निखारने में प्रमुख भूमिका निभाई और इन्ही के प्रेरणा से वे एक कुशल वक्ता बने | पंडित मदनमोहन मालवीय जी के घर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी | इनके पिता बड़ी कठिनाई से इन्हें स्नातक तक शिक्षा दिला पाए और घर की दशा को देखते हुए मालवीय जी ने सरकारी हाईस्कूल में शिक्षक के पद पर कार्य करना आरम्भ कर दिया | अपनी अदभुत वक्तृता व शिक्षण शैली के कारण वे अच्छे व लोकप्रिय शिक्षक के रूप में विख्यात हो गए | मालवीय जी देशभक्ति को धर्म का ही एक अंग मानते थे, वे धार्मिक संकीर्णता व साम्प्रदायिकता के घोर विरोधी थे.वे देश की प्रगति व उत्थान के लिए सर्वस्व त्याग व समर्पण की भावना के पोषक थे | मदन मोहन मालवीय एक भारतीय शिक्षाविद और राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता अभियान में मुख्य भूमिका अदा की थी और साथ ही वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के चार बार अध्यक्ष भी रह चुके थे | आदर और सम्मान के साथ उन्हें पंडित मदन मोहन मालवीय और महामना के नाम से भी बुलाया जाता था | सन 1902 में संयुक्त प्रान्त (उत्तरप्रदेश) असेम्बली के चुनाव में मालवीय जी सदस्य निर्वाचित हुए | अपनी सूझ-बुझ,लगन और निष्ठा के कारण उन्हें यहाँ भी पर्याप्त सम्मान मिला व सन 1910 से 1920 तक वे केन्द्रीय असेम्बली के सदस्य भी रहे | सन 1931 में लन्दन में आयोजित द्वितीय गोलमेल सम्मेलन में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया | यहाँ उन्होंने खुलकर भारतीय पक्ष को सम्मलेन में प्रस्तुत किय और उन्होंने सम्मलेन में साम्प्रदायिकता का विरोध किया और सामाजिक सदभाव तथा समरसता पर जोर दिया | मालवीय को ज्यादातर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिये याद किया जाता है जिसकी स्थापना उन्होंने 1916 में वाराणसी में की थी, इस विश्वविद्यालय की स्थापना B.H.U. एक्ट 1915 के तहत की गयी थी | उस समय यह एशिया की सबसे बड़ी रेजिडेंशियल यूनिवर्सिटी में से एक और साथ की दुनिया की सबसे बड़ी विश्वविद्यालय में से एक है जिसमे आर्ट, साइंस, इंजीनियरिंग, मेडिकल, एग्रीकल्चरल, परफार्मिंग आर्ट्स, लॉ एंड टेक्नोलॉजी के तक़रीबन 35000 विद्यार्थी शिक्षा लेते हैं | 1919 से 1938 तक मालवीय बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर भी रह चुके थे और साथ ही 1905 में हरिद्वार में हुई गंगा महासभा के वे संस्थापक भी थे | 1934 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी | असहयोग आंदोलन के चतुर्सूत्री कार्यक्रम में शिक्षा संस्थाओं के बहिष्कार का मालवीयजी ने खुलकर विरोध किया जिसके कारण उनके व्यक्तित्व के प्रभाव से हिन्दू विश्वविद्यालय पर उसका अधिक प्रभाव नहीं पड़ा। 1921 ई0 में कांग्रेस के नेताओं तथा स्वयंसेवकों से जेल भर जाने पर वाइसराय लॉर्ड रीडिंग को प्रान्तों में स्वशासन देकर गाँधी जी से सन्धि कर लेने को मालवीयजी ने भी सहमत कर लिया था परन्तु 4 फ़रवरी 1922 के चौरीचौरा काण्ड ने इतिहास को पलट दिया। गाँधी जी ने बारदौली की कार्यकारिणी में बिना किसी से परामर्श किये सत्याग्रह को अचानक रोक दिया। इससे कांग्रेस जनों में असन्तोष फैल गया और यह प्रतीत होने लगा कि बड़ा भाई के कहने में आकर गाँधी जी ने यह भयंकर भूल की है। गाँधी जी स्वयं भी पाँच साल के लिये जेल भेज दिये गये। इसके परिणामस्वरूप चिलचिलाती धूप में इकसठ वर्ष के बूढ़े मालवीय ने पेशावर से डिब्रूगढ़ तक तूफानी दौरा करके राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखा। इस भ्रमण में उन्होंने बहुत बार कुख्यात धारा 144 का उल्लंघन भी किया जिसे सरकार खून का घूँट समझकर पी गयी। परन्तु 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में उसी ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बम्बई में गिरफ्तार कर लिया जिस पर श्रीयुत् भगवान दास ने कहा था कि मालवीयजी का पकड़ा जाना राष्ट्रीय यज्ञ की पूर्णाहुति समझी जानी चाहिये। उसी साल दिल्ली में अवैध घोषित कार्यसमिति की बैठक में मालवीयजी को पुन: बन्दी बनाकर नैनी जेल भेज दिया गया। यह उनकी जीवनचर्या तथा वृद्धावस्था के कारण यथार्थ में एक प्रकार की तपस्या थी। मदनमोहन मालवीय के नाम पर इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली, भोपाल और जयपुर में रिहायशी क्षेत्रों को मालवीय नगर नाम दिया गया। उनके सम्मान में भारत सरकार ने एक डाक टिकट जारी किया । उनके नाम पर मालवीय नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्टनोलॉजी, जयपुर और मदन मोहन इंजीनियर कॉलेज गोरखपुर, उत्तरप्रदेश का नामकरण किया गया। मदन मोहन मालवीय की पहल पर शुरू की गई आरती हरिद्वार में हर की पौड़ी घाट पर अब भी की जाती है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में असेंबली हॉल के मुख्य द्वार पर और पोर्च के बाहर पंडित मदन मोहन मालवीय की अर्द्ध प्रतिमाएं हैं। इनका उद्घाटन 25 दिसंबर 1971 को पंडित जी की जयंती पर किया गया था। जीवन के अंतिम वर्षों में बीमारी के चलते मदन मोहन मालवीय का निधन 12 नवंबर 1946 को हो गया। Source- http://hindi.culturalindia.net/ , http://www.gyanipandit.com/

General Administration Department
Goverment of NCT of Delhi