Shaheed Kosh

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भाई बालमुकुंद का जन्म सन 1889 को करियाला, ज़िला जेहलम, पाकिस्तान में हुआ था। इनके पिता का नाम भाई मथुरादास था। भाई बालमुकुंद के खानदान में अपने सिद्धांतों पर मर मिटने की प्रथा बड़ी पुरानी थी। गुरु नानक के अनुयायी पहले शांति के पुजारी थे, पर जब मुग़लों ने उन्हें दबाना चाहा तो ये ही शांतिप्रिय शिष्य तलवार उठाने पर विवश हुए। यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन था। इस परिवर्तन के पीछे भाई बालमुकुंद के पूर्वपुरुषों का बहुत बड़ा योग था। इसी कुल में मतिदास हुए, जो गुरु तेग़ बहादुर के साथ शहीद हुए। उन्हें लकड़ी के दोशहतीरों के के बीच रखकर आरी से चीरा गया। इस बलिदान के कारण गुरु गोविंदसिंह ने इस कुल के लोगों को भाई की उपाधी दी थी। इसी त्याग-तपस्या से उज्ज्वल कुल में भाई बालमुकुंद का जन्म हुआ था। बालमुकुंद लाहौर के डी.ए.वी. कॉलेज में पढ़कर स्नातक हुए और फिर उन्होंने शिक्षक बनने के उद्देश्य से बी.टी. की परीक्षा भी पास कर ली। 1910 के बी.टी.सी. उत्तीर्ण परीक्षार्थियों में उनका नंबर तीसरा था। बचपन से ही बालमुकुंद की रुची व्यापक थी। भाई परमानंद और वह, दोनों गाँव के अन्य बालकों से भिन्न थे। पास ही एक नाला था, जिसे बनह्वा कहते थे। वर्षा के दिनों में यह नदी का रूप धारण कर लेता था और उसको पार करना कुशल तैराक का ही काम होता था। उसी नाले के किनारे तपसीराम नाम के साधु रहते थे, जो आम साधुओं से भिन्न थे। तपसीराम अच्छे ज़मींदार घराने के थे। वह उसी नाले के किनारे पर गुफा में रहते थे। गाँव में जब कभी कोई झगड़ा होता, वह फौरन वहाँ पहुंचते और न्यायपक्ष में बोलते। इससे वह 'महाराज' नाम से मशहूर हो गये थे। महाराज अंग्रेज़ी राज्य के विरुद्ध थे। उन्होंने एक अखाड़ा खोल रखा था, जहं शारीरिक क्षमता बढ़ाने के लिए व्यायाम और खेलकूदों का बाकायदा अभ्यास चलता था। इस वातावरण में अग्रेंज़ी-विरोधी महाराज का दोनों भाइयों पर काफ़ी प्रभाव पड़ा । बाद में इस प्रभाव को गाढ़ा होने का मौका तब मिला, जब भाई बालमुकुंद की भेंट मास्टर अमीरचंद, लाला हरदयाल और रासबिहारी बोस से हुई और वह क्रांतिकारी बन गये। इस बीच उन्होंने नौकरी कर ली थी, पर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। तब उनके बड़े भाई जयरामदास को चिंता हुई और उन्होंने बालमुकुंद विवाह करवा दिया। विवाह हो जाने पर भाई बालमुकुंद का मन क्रांति से नहीं फिरा, बल्कि अवधबिहारी और भाई बालमुकुंद ने क्रांतिकारी साहित्य डट कर तैयार किया और सर्वत्र बांटा। साथ ही वह बम बनाने की भी शिक्षा लेते रहे। 23 दिसंबर, 1912 को लॉर्ड हार्डिंग के जुलूस पर चाँदनी चौक में जो बम फेंका गया, उससे वाइसराय बाल-बाल बचा। इस बमकाण्ड में बसंत कुमार विश्वास के अलावा भाई बालमुकुंद का सक्रिय सहयोग था। दोनों बुर्के पहने स्त्रियों की भीड़ में थे। वहीं से बम गिराया गया। भाई बालमुकुंद को इस बात का बड़ा दु:ख रहा कि वाइसराय बच गया। इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी को भाई परमानंद के घरवालों के पास छोड़ा और स्वयं जोधपुर के राजकुमारों के ट्यूटर बन गये। योजना यह थी कि लॉर्ड हार्डिंग यहाँ कभी-कभी आयेगा और वह नजदीक से उन पर बम फेंक कर अधूरा काम पूरा करेंगे। पुलिस को बहुत दिनों तक पता नहीं चल पाया कि चाँदनी चौक के बमकांड के पीछे कौन था। लेकिन, आखिर में 16 फ़रवरी, 1914 को वह गिरफ्तार कर लिये गये। सभी पर आरोप था कि इन्होंने 1912 में चांदनी चौक में लार्ड हार्डिग पर बम फेंका था। हालांकि इनके खिलाफ जुर्म साबित नहीं हुआ, लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने शक के आधार पर इन्हें फांसी की सजा सुना दी। 8 मई, 1915 को मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकुंद और मास्टर अवध बिहारी को फ़ाँसी पर लटका दिया गया, जिस स्थान पर इन्हें फांसी दी गई, वहां शहीद स्मारक बना दिया गया है जो दिल्ली गेट स्थित मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में स्थित है। भाई बालमुकुंद का विवाह एक साल पहले ही हुआ था। आजादी की लड़ाई में जुटे होने के कारण वे कुछ समय ही पत्नी के साथ रह सके। उनकी पत्नी का नाम रामरखी था। उनकी इच्छा थी कि भाई बालमुकुंद का शव उन्हें सौंप दिया जाए, लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने उन्हें शव नहीं दिया। उसी दिन से रामरखी ने भोजन व पानी त्याग दिया और अठारहवें दिन उनकी भी मृत्यु हो गई। भाई बालमुकुंद दिल्ली षड़यंत्र में फ़ाँसी पाने वाले प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे। Source- http://bharatdiscovery.org/, wikipedia COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan

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