Shaheed Kosh

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बिहार प्रान्त के एक छोटे से गाँव जिरादेयी में 3 दिसम्बर 1884 को राजेन्द्र प्रसाद का जन्म हुआ था । राजेन्द्र प्रसाद अपने परिवार में सबसे छोटे सदस्य थे, इसलिए वह सबके दुलारे थे। राजेन्द्र प्रसाद के परिवार के सदस्यों के सम्बन्ध गहरे और मृदु थे। राजेन्द्र प्रसाद को अपनी माता और बड़े भाई महेन्द्र प्रसाद से बहुत स्नेह था राजेन्द्र प्रसाद प्रतिभाशाली और विद्वान थे और कलकत्ता के एक योग्य वकील के यहाँ काम सीख रहे थे। राजेन्द्र प्रसाद का भविष्य एक सुंदर सपने की तरह था । राजेन्द्र प्रसाद का परिवार उनसे कई आशायें लगाये बैठा था। वास्तव में राजेन्द्र प्रसाद के परिवार को उन पर गर्व था । लेकिन राजेन्द्र प्रसाद का मन इन सब में नहीं था । राजेन्द्र प्रसाद केवल धन और सुविधायें पाने के लिए आगे पढ़ना नहीं चाहते थे। एकाएक राजेन्द्र प्रसाद की दृष्टि में इन चीज़ों का कोई मूल्य नहीं रह गया था। राष्ट्रीय नेता गोखले के शब्द राजेन्द्र प्रसाद के कानों में बार-बार गूँज उठते थे। | राजेंद्र प्रसाद, महात्मा गांधी के काफी करीबी सहयोगी भी थे। इसी वजह से वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में भी शामिल हो गए थे और बाद में बिहार क्षेत्र के प्रसिद्ध नेता बने। नमक सत्याग्रह के वे सक्रीय नेता थे और भारत छोडो आंदोलन में भी उन्होंने भाग लिया था और ब्रिटिश अधिकारियो को घुटने टेकने पर मजबूर किया था । राजेन्द्र प्रसाद की मातृभूमि विदेशी शासन में जकड़ी हुई थी । राजेन्द्र प्रसाद उसकी पुकार को कैसे अनसुनी कर सकते थे । लेकिन राजेन्द्र प्रसाद यह भी जानते थे कि एक तरफ देश और दूसरी ओर परिवार की निष्ठा उन्हें भिन्न-भिन्न दिशाओं में खींच रही थी। राजेन्द्र प्रसाद का परिवार यह नहीं चाहता था कि वह अपना कार्य छोड़कर 'राष्ट्रीय आंदोलन' में भाग लें क्योंकि उसके लिए पूरे समर्पण की आवश्यकता होती है। राजेन्द्र प्रसाद को अपना रास्ता स्वयं चुनना पड़ेगा। यह उलझन मानों उनकी आत्मा को झकझोर रही थी । राजेन्द्र प्रसाद के पिता का देहान्त हो चुका था । राजेन्द्र प्रसाद के बड़े भाई ने पिता का स्थान लेकर उनका मार्गदर्शन किया था और उच्च आदर्शों की प्रेरणा दी थी। राजेन्द्र प्रसाद उन्हें अकेला कैसे छोड़ सकते थे? अगले दिन ही उन्होंने अपने भाई को पत्र लिखा, "मैंने सदा आपका कहना माना है और यदि ईश्वर ने चाहा तो सदा ऐसा ही होगा।" दिल में यह शपथ लेते हुए कि अपने परिवार को और दु:ख नहीं देंगे उन्होंने लिखा, "मैं जितना कर सकता हूँ, करूँगा और सब को प्रसन्न देख कर प्रसन्नता का अनुभव करूँगा।" लेकिन उनके दिल में उथल-पुथल मची रही। एक दिन वह अपनी आत्मा की पुकार सुनेंगे और स्वयं को पूर्णतया अपनी मातृभूमि के लिए समर्पित कर देंगे। यह युवक राजेन्द्र थे जो चार दशक पश्चात 'स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति' बने। राजेन्द्र प्रसाद चम्पारन आंदोलन के दौरान गांधीजी के वफ़ादार साथी बन गये। क़्ररीब 25,000 किसानों के बयान लिखे गये और अन्ततः यह काम उन्हें ही सौंप दिया गया। बिहार और उड़ीसा की सरकारों ने अन्ततोगत्वा इन रिपोर्टों के आधार पर एक अधिनियम पास करके चंपारण के किसानों को लम्बे वर्षों के अन्याय से छुटकारा दिलाया । सत्याग्रह की वास्तविक सफलता लोगों के हृदय पर विजय थी । गांधीजी के आदर्शवाद, साहस और व्यावहारिक सक्रियता से प्रभावित होकर राजेन्द्र प्रसाद अपने पूरे जीवन के लिये उनके समर्पित अनुयायी बन गये। बाबू राजेन्द्र प्रसाद के हृदय में मानवता के लिये असीम दया थी। 'स्वार्थ से पहले सेवा' शायद यही उनके जीवन का ध्येय था। जब सन् 1914 में बंगाल और बिहार के लोग बाढ़ से पीड़ित हुए तो उनकी दयालु प्रकृति लोगों की वेदना से बहुत प्रभावित हुई। उस समय वह स्वयंसेवक बन नाव में बैठकर दिन-रात पीड़ितों को भोजन और कपड़ा बांटते। रात को वह निकट के रेलवे स्टेशन पर सो जाते। इस मानवीय कार्य के लिये जैसे उनकी आत्मा भूखी थी और यहीं से उनके जीवन में निस्स्वार्थ सेवा का आरम्भ हुआ । बिहार में असहयोग आंदोलन 1921 में फैल गया था । राजेन्द्र प्रसाद दूर-दूर की यात्रायें करते, सार्वजनिक सभायें बुलाते, जिससे सबसे सहायता ले सकें और धन इकट्ठा कर सकें। उनके लिये यह एक नया अनुभव था। उनके नेतृत्व में गांवों में सेवा समितियों और पंचायतों का संगठन किया गया। लोगों से अनुरोध किया गया कि विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करें और खादी पहनें व चर्खा कातना आरम्भ करें ।सरकार ने इसके उत्तर में अपना दमन चक्र चलाया। हज़ारों लोग जिनमें लाला लाजपत राय, जवाहर लाल नेहरू, देशबन्धु चितरंजन दास और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे प्रसिद्ध नेता गिरफ्तार कर लिये गये । आंदोलन का अनोखापन था उसका अहिंसक होना। लेकिन फ़रवरी सन् 1922 में गांधीजी ने 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' की पुकार दी किन्तु चौरी चौरा, उत्तर प्रदेश में हिंसक घटनायें होने पर गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया। उन्हें लगा कि हिंसा न्यायसंगत नहीं है। और राजनीतिक सफलता को कुछ समय के लिये स्थगित किया जाना ही अच्छा है। जिससे नैतिक असफलता से बचा जा सके। कई नेताओं ने आंदोलन को स्थगित करने के लिये गांधी जी की कड़ी आलोचना की लेकिन राजेन्द्र प्रसाद ने दृढ़ता के साथ उनका साथ दिया। उन्हें गांधीजी की बुद्धिमत्ता पर पूर्ण विश्वास था। जनवरी सन् 1934 में बिहार को एक भंयकर भूकम्प ने झकझोर दिया था । जीवन और संपति की बहुत हानि हुई। राजेन्द्र प्रसाद अपनी अस्वस्थता के बाद भी राहत कार्य में जुट गये। वह उन लोगों के लिये जिनके घर नष्ट हो गये थे, भोजन, कपड़ा और दवाइयां इकट्ठी करते। भूकम्प के पश्चात बिहार में बाढ़ और मलेरिया का प्रकोप हुआ। जिससे जनता की तकलीफें और भी बढ़ गई। इस भूकम्प और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में काम करने में गांधी जी ने राजेन्द्र प्रसाद का साथ दिया । राजेन्द्र प्रसाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक से अधिक बार अध्यक्ष रहे । सन् 1934 अक्तूबर में बम्बई में हुए इंडियन नेशनल कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता राजेन्द्र प्रसाद ने की थी। उन्होंने गांधी जी की सलाह से अपने अध्यक्षीय भाषण को अंतिम रूप दिया । लम्बे वर्षों तक ख़ून पसीना एक कर के और दुख उठाने के पश्चात 15 अगस्त, सन् 1947 को आज़ादी मिली, यद्यपि राजेन्द्र प्रसाद के अखण्ड भारत का सपना विभाजन से खंडित हो गया था। 26 जनवरी १९५० को भारत को राजेंद्र प्रसाद के रूप में भारत को प्रथम राष्ट्रपति मिल गया | 1957 में दोबारा राष्ट्रपति का चुनाव हुआ जिसमें उन्हें फिर से राष्ट्रपति बनाया गया | सन 1962 में अवकाश प्राप्त करने पर राष्ट्र ने उन्हें "भारत रत्‍न" की सर्वश्रेष्ठ उपाधि से सम्मानित किया। यह उस पुत्र के लिये कृतज्ञता का प्रतीक था जिसने अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर आधी शताब्दी तक अपनी मातृभूमि की सेवा की थी । अपने जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लिये उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना। यहाँ पर 28 फ़रवरी 1963 में उनके जीवन की कहानी समाप्त हुई। Source- http://bharatdiscovery.org/ , http://hindi.webdunia.com/, http://www.deepawali.co.in/ ,

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