Shaheed Kosh

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मौलवी अहमदुल्ला का जन्म अवध के एक तालुकेदार परिवार में हुआ था। और अंग्रेजों के सामने अवध की हार से आहत होकर उन्होनें अपना सर्वस्व देश की सेवा में लगाने का संकल्प लिया । वे लोगों में धार्मिक उपदेश के साथ ही विदेशी हकूमत और शोषण के खिलाफ एकजुट होने को भी प्रचारित करते थे। वे 1856 को जब लखनऊ पहुंचे तब पुलिस ने उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया। प्रतिबंध के बावजूद जब उन्होंने इसे बंद नही किया तो अंग्रेजी सरकार ने उन्हें बंदी बना कर फैजाबाद जेल में बंद कर दिया। 8 जून 1857 को सूबेदार दिलीप सिंह के नेतृत्व बंगाल के बाद फैजाबाद जेल पर हमला कर सारे क्रांतिकारियों के साथ उन्हें भी छुडा लिया। 8 जून को अंग्रेजों तथा क्रांतिकारियों के मध्य सीधे मुकाबला हुआ जिसमें अंग्रेज हार गये तथा फैजाबाद को आजाद घोषित कर दिया गया और फैजाबाद जुलाई 1858 तक स्वतंत्र रहा तथा मौलवी ने जमींदार राजा मान सिंह को फैजाबाद का प्रशासक बना दिया। इसके बाद उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी की 22 वी इन्फ्रेंट्री का प्रमुख नियुक्त किया गया। इसकेे बाद वे अपनी सेना के साथ लखनऊ के ओर बढें लखनऊ से पहले चिनहट पर हेनरी लारेन्स के नेतृत्व में अंग्रेजों की सेना के साथ इनका सामना हुआ जिसमें अंग्रेजों की सेना बुरी तरह से पराजित हुई। इस पराजय से अंग्रेज बुरी तरह से बौखला गये। 4 मई 1858 के मौलवी के साथ बेगम हजरत महल व नाना साहब पेशवा और दिल्ली के शहजादे फिरोज शाह बरेली पहुंचे। 5 मई को अंग्रेज सेनापति केम्पबेल ने इनको पकड़ने के लिए घेरा डाल दिया और बरेली से निकल कर शाहजहांपुर पर धावा बोल दिया। कैम्पबेल जब पुनः लौटा तो मौलवी ने छापामार युद्ध नीति से अवध के आस-पास के क्षेत्रों में अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। वे अवध क्षेत्र में इधर उधर धूमते थे तथा मौका पाते ही टुकडों में अंग्रेजों के ऊपर धावा बोल दिया करते थे। मौलवी अहमदुल्ला पकड़ पाने में हताश अंग्रेजी सरकार ने इनके ऊपर पचास हजार का इनाम रख दिया। उनके ऊपर ब्रिटिश सरकार ने 50 हजार रूपये का इनाम रखा गया था जिसकी लालच में पुवायां के राजा जगन्नाथ सिंह ने इन्हें अपने घर पर आमंत्रित करके उन्हें 5 जून 1858 को अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार करवा दिया। जिसके बाद उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था। मौलवी अहमदुल्ला के नेतृत्व में वहाबी आंदोलन ने अंग्रेज विरोधी रुख धारण कर लिया था | भारत में अंग्रेजो के विरुद्ध कोई सेना खड़ी नही कि जा सकती थी | इस कारण मौलवी अहमदुल्ला ने मुजाहिदीनों की एक फ़ौज सीमा पार इलाके के सीताना स्थान पर खड़ी की | उस सेना के लिए वे धन जन और हथियार भारत से ही भेजते थे | मौलवी अहमदुल्ला को बड़ी चालाकी के साथ गिरफ्तार कर लिया गया | और मौलवी साहब को कालेपानी की काल कोठरियों में दाल दिया गया | लेकिन वही से वो भारत में चलने वाली वहाबी आंदोलन को निर्देशित करते रहे | मौलवी अहमदुल्ला ने पुरे २५ वर्ष तक अंग्रेजो के विरुद्ध संघर्ष का संचालन किया | स्वाधीन भारत उस महान देशभक्त का ऋणी है | अंग्रेजी हकूमत के बारें कहा जाता था कि उसके शासन में सूरज कभी नहीं डूबता था। परन्तु जनपद फैजाबाद की धरती एक ऐसे की गाथा कहती है जिसने इसी जनपद में बिटानिया हकूमत का सूरज डुबोया ही नहीं बल्कि उसे अपने कब्जे में एक साल के लिए रखा। भारतीय स्वतंत्रता के पहले संग्राम 1857 में फैजाबाद को एक साल के लिए आजाद कराने वाले मौलवी अहमदुल्लाह को याद किए बिना फैजाबाद के लिए इस संग्राम का अतीत की यह कथा पूर्ण नहीं हो सकती है। मौलवी अहमदुल्लाह ने 1857 के विद्रोह को संगठित करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। मौलवी ने अंग्रेजों से इतना गहरा नुक्सान पहुचा था जिसके कारण उसके उपर अंग्रेज सरकार ने 50 हजार रूपये का ईनाम भी रखा था। उनके कुशल नेतृत्व में फैजाबाद को जून 1857 से जुलाई 1858 तक अंग्रेजों की गुलामी से आजाद रहा। COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan http://www.humsamvet.in/

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