Shaheed Kosh

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राजा महेन्द्र प्रताप का जन्म मुरसान नरेश राजा बहादुर घनश्याम सिंह के यहाँ 1 दिसम्बर सन 1886 ई. को हुआ था। राजा साहब पहले कुछ दिन तक अलीगढ़ के गवर्नमेन्ट स्कूल में और फिर अलीगढ़ के एम.ए.ओ. कॉलेज में पढ़े। यही कॉलेज बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। राजा साहब को अलीगढ़ में पढ़ने सर सैयद अहमद ख़ाँ के आग्रह पर भेजा गया था, क्योंकि राजा साहब के पिताजी राजा घनश्याम सिंह की सैयद साहब से व्यक्तिगत मित्रता थी। इस संस्था की स्थापना के लिए राजा बहादुर ने यथेष्ट दान भी दिया था। उससे एक पक्का कमरा बनवाया गया, जिस पर आज भी राजा बहादुर घनश्याम सिंह का नाम लिखा हुआ है। राजा साहब स्वयं हिन्दू वातावरण में पले परन्तु एम.ए.ओ. कॉलेज में पढ़े। इसका एक सुखद परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम धर्म और मुसलमान बन्धुओं का निकट सम्पर्क उन्हें मिला और एक विशिष्ट वर्ग के व्यक्ति होने के कारण तब उनसे मिलना और उनके सम्पर्क में आना सभी हिन्दू मुस्लिम विद्यार्थी एक गौरव की बात मानते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि राजा साहब का मुस्लिम वातावरण तथा मुसलमान धर्म की अच्छाइयों से सहज ही परिचय हो गया और धार्मिक संकीर्णता की भावना से वह सहज में ही ऊँचे उठ गए। बाद में जब राजा साहब देश को छोड़ कर विदेशों में स्वतंत्रता का अलख जगाने गये, तब मुसलमान बादशाहों से तथा मुस्लिम देशों की जनता से उनका हार्दिक भाईचारा हर जगह स्वयं बन गया। हमारी राय से राजा साहब के व्यक्तित्व की यह विशेषता उन्हें इस शिक्षा संस्थान की ही देन है। राजा महेन्द्र प्रताप का जीवन-क्रम आरम्भ से ही जहाँ एक तूफान के समान निरंतर वेगवान था, वहीं वह आस्था, विश्वास और परोपकार की सुरभि से सुरभित भी रहा। मौलिक चिन्तन, दृढ़ निश्चय, अदम्य उत्साह और एक-एक क्षण के सदुपयोग की प्रबल उत्कंठा उनमें किशोरावस्था से ही अपने राज्याधिकार प्राप्ति काल में भी विद्यमान थी। प्राचीनता के प्रति श्रद्धा और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास रखते हुए भी नवीन युग की नव चेतना को बचपन से ही उन्होंने आगे बढ़कर अपनाया। अन्ध विश्वासों के लिए उनके मन में कभी कोई मोह नहीं रहा और कदाचित किसी आतंक से डरना उनकी जन्मघुट्टी में ही नहीं था। बचपन से ही यह ऐसे दृढ़ निश्चयी थे कि एक बार जो बात मन में जम गई, उससे हटना या विचलित होना, वह जानते ही नहीं। प्रथम विश्वयुद्ध के दिनों में भारत की आज़ादी के इस स्वप्नद्रष्टा का नाम राजा महेंद्रप्रताप सिंह था | युद्ध की स्थिती का भारत के पक्ष में पूरा लाभ उठाने के लिए उन्होंने एक दिन भी व्यर्थ खोना उचित नही समझा | अपनी निजी संपति बेचकर थोडा धन जमा किया और बंबई पहुँचकर जहाज द्वारा यूरोप के लिए प्रस्थान कर दिया | उन्होंने यह व्यस्था भी कर ली कि जब आवश्यकता पड़े, उन्हें यूरोप में धन प्राप्त होता रहे | अपना शेष समय राजा ने संसार के विभिन्न देशों में अपनी कल्पना के ‘आर्यन ‘ की कल्पना कर रहे थे | सन १९३७ में जब भारत में आठ प्रांतो में कांग्रेस मंत्रिमंडल की स्थापना हुई तो भारतवासियों ने कांग्रेस पर जोर डाला कि वह राजा महेंद्र को भारत आने की अनुमति ब्रिटिश हुकूमत से प्राप्त करे | कांग्रेस को इस प्रत्यन में सफलता नही मिल सकी | राजा को १९४६ में अनुमति मिल सकी . जब अंग्रेजों ने अपने बोरिये – बिस्तर उठा लेने का निर्णय ले लिया | भारत को राजा महेंद्रप्रताप जैसे क्रांतिकारी और देशभक्त पर गर्व है | राजा साहब ने राजनीति में भी अपना दबदबा बनाया और स्वतंत्र रूप से 1957 का मथुरा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुँचे। COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan

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