Shaheed Kosh

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मोतीलाल नेहरू का जन्म 6 मई 1861 को एक कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता गंगाधर और माता जीवरानी थीं। मोतीलाल नेहरू के पिता की मृत्यु मोतीलाल के जन्म से पूर्व ही हो गयी। मोतीलाल नेहरू का पालन पोषण उनके बड़े भाई नन्दलाल द्वारा हुआ जो इलाहाबाद में एक सामान्य वकील थे। मोतीलाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पिता थे। ये कश्मीरी ब्राह्मण थे। इनकी पत्नी का नाम 'स्वरूप रानी' था। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में मोतीलाल नेहरू एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने न केवल अपनी ज़िंदगी की शानोशौकत को पूरी तरह से ताक पर रख दिया बल्कि देश के लिए परिजनों सहित अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। मोतीलाल नेहरू अपने समय में देश के प्रमुख वकीलों में थे। वह पश्चिमी रहन-सहन, वेषभूषा और विचारों से काफ़ी प्रभावित थे। किंतु बाद में वह जब महात्मा गांधी के संपर्क में आए तो उनके जीवन में परिर्वतन आ गया। पंडित मोतीलाल नेहरू अपने समय के शीर्ष वकीलों में थे। उस समय वह हज़ारों रुपए की फीस लेते थे। उनके मुवक्किलों में अधिकतर बड़े ज़मींदार और स्थानीय रजवाड़ों के वारिस होते थे, किंतु वह गरीबों की मदद करने में पीछे नहीं रहते थे। पंडित मोतीलील नेहरू ने अपनी पढ़ाई-लिखाई की ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। जब बी.ए. की परीक्षा का समय आया तो उन्होंने परीक्षा की तैयारी बिलकुल ही नहीं की थी। उन्होंने पहला ही पेपर किया था तो लगा कि इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं है, क्योंकि उस पेपर से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ है और सोचकर उन्होंने बाकी पेपर नहीं दिए और ताजमहल की सैर करने चले गए। लेकिन वह पेपर ठीक ही हुआ था। इसलिए प्रोफेसर ने उन्हें बुलाकर बहुत डांटा, लेकिन अब क्या हो सकता था। इसका परिणाम यह हुआ कि मोतीलाल नेहरू की शिक्षा यहीं समाप्त हो गई। वह बी.ए. पास नहीं कर पाए। उनकी शुरुआती शिक्षा कानपुर और बाद में इलाहाबाद में हुई और 1883 में कानपुर में एक वकील के रूप में अपना करियर प्रारम्भ कर दिया । बाद में मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद में बस गए और देश के सर्वश्रेष्ठ वकीलों के रूप में अपनी पहचान बनाई। वह हर महीने लाखों कमाते थे और बड़े ठाट-बाट से रहते थे। उन्होंने इलाहाबाद की सिविल लाइंस में एक बड़ा घर ख़रीदा। उन्होंने कई बार यूरोप का दौरा किया और पश्चिमी जीवन शैली को अपनाया। 1909 में ग्रेट ब्रिटेन के प्रिवी काउंसिल में वकील बनने का अनुमोदन प्राप्त कर वह अपने कानूनी पेशे के शिखर पर पहुँच गए। 1910 में मोतीलाल ने संयुक्त प्रान्त की विधान सभा का चुनाव लड़ा और जीत हांसिल की। महात्मा गांधी के भारतीय राजनीति के परिदृश्य में आगमन ने मोतीलाल नेहरू को पूरी तरहं बदल दिया। 1919 में हुए जलियांवाला बाग़ नरसंहार ने ब्रिटिश शासन के प्रति उनके विश्वास को तोड़ दिया और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश करने का फैसला किया। ब्रिटिश सरकार ने जलियाँवाला बाग की घटना की जांच के लिए एक आयोग की नियुक्ति की। कांग्रेस ने इसका विरोध किया और अपनी खुद की जाँच समिति नियुक्त की। महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, चित्तरंजन दास इस समिति के सदस्य थे। असहयोग आंदोलन में गांधीजी का अनुसरण करने के लिए उन्होंने अपनी वकालत छोड़ दी। उन्होंने विलासितापूर्ण अपनी जीवन शैली, वेस्टर्न कपडे और दूसरी वस्तुओं का त्याग कर दिया और खादी पहनना शुरू कर दिया। मोतीलाल नेहरू 1919 और 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने देशबन्धु चित्तरंजन दास के साथ मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की। मोतीलाल नेहरू स्वराज पार्टी के पहले सचिव और बाद में अध्यक्ष बने। वह केंद्रीय विधान सभा में विपक्ष के नेता बने और सरकार के निर्णयों की पोल खोलते हुए जोर शोर से इसका विरोध किया। पंडित मोतीलाल की क़ानून पर पकड़ काफ़ी मज़बूत थी। इसी कारण से साइमन कमीशन के विरोध में सर्वदलीय सम्मेलन ने 1927 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जिसे भारत का संविधान बनाने का दायित्व सौंपा गया। इस समिति की रिपोर्ट को 'नेहरू रिपोर्ट' के नाम से जाना जाता है। मोतीलाल नेहरू ने आज़ादी के आंदोलन में भारतीय लोगों के पक्ष को सामने रखने के लिए 'इंडिपेंडेट अख़बार' भी चलाया। भारत की आज़ादी के लिए कई बार जेल जाने वाले मोतीलाल नेहरू का निधन 6 फरवरी, 1931 ई. को लखनऊ में हुआ। Source- http://bharatdiscovery.org/

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