Shaheed Kosh

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सेठ अमरचंद बाठिया ग्वालियर राज्य के गंगाजली कोष के अध्यक्ष थे | जिन्होंने 1857 के महासमर में जूझ कर क्रांतिवीरों को संकट के समय आर्थिक सहायता देकर मुक्ति-संघर्ष के इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया । उनपे ब्रिगेडियर नेपियर ने आरोप लगाया था कि गंगाजली कोष का अपार धन महारानी लक्ष्मीबाई के सैनिकों को बांट देने का था | सेठ अमरचंद ने आरोप नकार दिया था | अमरचंद बांठिया में धर्मनिष्ठा, दानशीलता, सेवाभावना, ईंमानदारी, कर्तव्यपरायण्ता आदि गुण जन्मजात ही थे | अमरचंद बांठिया इस खजाने के रक्षक ही नहीं ज्ञाता भी थे। सेना के अनेक अधिकारियों का आवागमन कोषालय में प्रायः होता रहता था। बाठिया जी के सरल स्वभाव और सादगी ने सबको अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। चर्चा में अंग्रेजों द्वारा भारतवासियों पर किये जा रहे अत्याचारों की भी चर्चा होती थी। एक दिन एक सेनाधिकारी ने कहा कि आपको भी भारत माँ को दासता से मुक्त कराने के लिये हथियार उठा लेना चाहिये। बांठिया जी ने कहा- भाई अपनी शारीरिक विषमताओं के कारण में हथियार तो नहीं उठा सकता पर समय आने पर ऐसा काम करुंगा, जिससे क्रांति के पुजारियों को शक्ति मिलेगी और उनके हौसले बुलन्द हो । तभी 1857 की क्रांति के समय महारानी लक्ष्मीबाई उनके सेना नायक राव साहब और तांत्या टोपे आदि क्रांतिवीर ग्वालियर के रणक्षेत्र में ब्रितानियों के विरुद्ध डटे हुए थे, परन्तु लक्ष्मीबाई के सैनिकों और ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों को कई माह से वेतन नहीं मिला था, न राशन पानी का समुचित प्रबन्ध हो सका था। तब अमरचंद बाठिया जी ने अपनी जान की परवाह न करते हुए क्रांतिकारियों की मदद की | उन्होंने वीरांगना लक्ष्मीबाई की क्रांतिकारी सेनाओ के सहायतार्थ एक ऐसा साहसिक निर्णय लिया जिसका सीधा सा अर्थ उनके अपने जीवन की आहुति से था। अमरचंद बांठिया ने राव साहब के साथ स्वेच्छापूर्वक सहयोग किया तथा राव साहब प्रशासनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ग्वालियर के राजकीय कोषागार से समुचित धन राशि प्राप्त करने में सफ़ल हो सके। सेंट्रल इंडिया ऐजेंसी ऑफिस में ग्वालियर रेजीडेंसी की एक फ़ाइल में उपलब्ध विवरण के अनुसार 5 जून 1858 के दिन राव साहब राजमहल गये तथा अमरचंद बांठिया से गंगाजली कोष की चाबिया लेकर उसका दृश्यावलोकन किया। तत्पश्चात दूसरे दिन जब राव साहब बडे़ सवेरे ही राजमहल पहुंचे तो अमरचंद उनकी अगवानी के लिये मौजूद थे। गंगाजली कोष से धनराशि लेकर क्रांतिकारी सैनिकों को 5-5 माह का वेतन वितरित किया गया। महारानी बैजाबाई की सेनाओं के सन्दर्भ में भी ऐसा ही एक विवरण मिलता है। जब नरबर की बैजाबाई की फ़ौज संकट की स्थिति में थी, तब उनके फ़ौजी भी ग्वालियर आकर अपने अपने घोडे तथा 5 महीने की पगार लेकर लौट गये। इस प्रकार बांठिया जी के सहयोग से संकट-ग्रस्त फ़ौज ने राहत की सांस ली। अमरचंद बांठिया से प्राप्त धनराशि से बाकी सैनिकों को भी उनका वेतन दे दिया गया। हिस्ट्री आफ़ दी इंडियन म्यूटिनी, भाग दो के अनुसार भी अमरचंद बांठिया के कारण ही क्रांतिकारी नेता अपनी सेनाओं को पगार तथा ग्रेच्युटी के भुगतान के रुप में पुरस्कृत कर सके थे। 1857 की क्रांति के समय यदि अमरचंद बांठिया ने क्रांतिवीरो की इस प्रकार आर्थिक सहायता न की होती तो उन वीरों के सामने कैसी स्थिति होती, इसकी कल्पना नही की जा सकती। क्रांतिकारी सेनाओं को काफ़ी समय से वेतन नही मिला था, उनके राशन पानी की भी व्यवस्था नही हो रही थी। इस कारण निश्चय ही क्रांतिकारियों के संघर्ष में क्षमता,साहस और उत्साह की कमी आती और लक्ष्मी बाई, राव साहब व तांत्या टोपे को संघर्ष जारी रखना कठिन पड जाता। यधपि बांठिया जी के साहसिक निर्णय के पीछे उनकी अदम्य देश भक्ति कि भावना छिपी हुई थी | अमरचंद बांठिया से प्राप्त इस सहायता से क्रांतिकारियों के हौसले बुलंद हो गये और उन्होंने ब्रितानियों की सेनाओ के दांत खट्टे कर दिये और ग्वालियर पर कब्जा कर लिया। 22 जून 1858 को ग्वालियर में ही राजद्रोह के अपराध में न्याय का ढोंग रचकर भीड़ भरे सर्राफ़ा बाजार में ब्रिगेड़ियर नैपियर द्वारा नीम के पेड से लटकाकर अमरचंद बांठिया को फ़ांसी दे दी गई। ग्वालियर के सर्राफ़ा बाजार में वह नीम आज भी है। इसी नीम के नीचे अमरचंद बांठिया का एक स्टेच्यू हाल ही में स्थापित किया गया है। COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan http://www.kranti1857.org/

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