Shaheed Kosh

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फ्रांस की राज्य क्रांति में जो महत्व रूसो एवं वाल्टेयर का है, वही स्थान भारतीय सशस्त्र क्रांति में रंगो बापूजी गुप्ते का है | गुप्ते ने महाराष्ट्र में क्रांति की संरचना करके अंग्रेजी साम्राज्य के लिए मुसीबत पैदा कर दी | इन महाभूनावो ने लोगों को केवल उकसाया ही नही, वे स्वयं भी क्रांति यज्ञ में कूद पड़े | १८५३ में लंदन से लौटने के बाद रंगो बापू ने बेलगावँ, धारवाड़, और सतारा के सम्पूर्ण इलाको में बड़े गोपनीय ढंग से उग्र क्रांति का प्रसार किया | इंग्लैंड की राजधानी लंदन में रंगो बापूजी गुप्ते जहाँ भी जाते लोगों के आकर्षण और मनोरंजन का केंद्र बन जाते थे । महाराष्ट्रियन ढंग की पंडिकाऊ धोती, घुटनों तक लटकने वाला बंद गले का कोट, कंधे पर झूलता हुआ दुपट्टा, सिर पर भारी पगड़ी, घनी और काली मूँछें तथा माथे पर आड़ा तिलक - यह थी उनकी वेशभूषा एवं बाह्य कृति। लोगों का अनुमान था, कि वह व्यक्ति ब्रितानी नह़ीं जानता होगा। पर जब वे उन्हें धाराप्रवाह ब्रितानी बोलते हुए देखते तो दंग रह जाते थे। उस व्यक्ति का नाम था । वह भारत में महाराष्ट्र के सतारा राज्य के राजा प्रतापसिंह की ओर से उनके कार्य के लिए लंदन गए थे। लंदन में उनकी भेंट अजीमुल्ला खाँ से हुई, जो नाना साहब पेशवा के कार्य से वहाँ गए हुए थे। परिस्थितियाँ ही व्यक्ति को बागी बनाती हैं। रंगो बापूजी गुप्ते अपने राजा की वकालत के लिए लंदन गए थे, पर वहाँ पहुँचकर वे पूर्णरूप से बागी बन गए। उनके मन में ब्रितानियों के प्रति धृणा ओर विद्धेष के भाव जाग्रत हो गए। संपूर्ण इंग्लैंड में उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दर्शन होते थे, पर भारत में इसके विपरीत दशा थी, जहाँ भारतीयों को किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता नहीं थी ब्रितानियों के आचरण के इस विरोघाभास ने उन्हें ब्रितानियों का कट्टर शत्रु बना दिया। इंग्लैंड में यधपि उन्हें अपने कार्य में सफलता तो नही मिली, पर अपने हदय में वैचारिक क्रांति का लहराता हुआ सागर लेकर वे सागर-सतरण करके भारत लौट आए । सन् 1858 में उनके एक निकट के मित्र ने विश्वासधात करके उन्हें ब्रितानियों के हाथों गिरफ्तार कराने का प्रयत्न किया, पर इस विश्वाधात की गंध पाकर के फरार हो गए | और पता नहीं कब इस महान क्रांतिकारी का देहावसान हो गया । COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan http://www.kranti1857.org/

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