Shaheed Kosh

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अमर सिंह बिहार के क्रांतिकारियों की ओर से अंग्रेजी सेना लगभग निश्चिंत हो चुकी थी | जगदीशपुर के राजा कुँवर सिंह के मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने सोचा कि बिहार में अब हम चैन की साँस ले सकेंगे ; पर ऐसा हुआ नही | कुँवर सिंह के स्थान पर उनके छोटे भाई अमर सिंह जगदीशपुर के राजा बने और पुरे जोश के साथ अंग्रेजों से युद्ध जारी रखा | अमर सिंह को अभी गद्दी पर बैठे केवल ४ दिन ही हुए थे कि उसने सुना कि आक्रमण करने के लिए अंग्रेजी फ़ौज का जमाव आरा में हो रहा है | शत्रु आक्रमण करे, इसके पहले ही अमर सिंह ने शत्रु पर आक्रमण कर दिया | आरा में घमासान युद्ध हुआ और अमरसिंह ने अंग्रेजी सेना को पराजित कर दिया | अमर सिंह बाबू कुंवर सिंह के सबसे छोटे भाई थे। उनके पिता का नाम साहिबजादा था। वो उन्हें बहुत प्यार करते थे। अमर सिंह ने धार्मिक प्रवृत्ति के होने के कारण भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों का भ्रमण किया था। अमर सिंह की पढ़ने-लिखने में रुचि थी। अमर सिंह पहले अँग्रेज़ों से संघर्ष के पक्ष में नहीं थे। उनका यह मानना था कि अँग्रेज़ बहुत शक्तिशाली है, परंतु बाबू कुवंरसिंह ने एक प्रमुख सरदार हर किशन के परामर्श पर क्रांति में भाग लेने का निश्चय किया। बाबू कुँवर सिंह ने अँग्रेज़ों का विरोध किया, तब अमर सिंह भी उनकी तरफ़ आकर्षित हुए। पहले हर किशन सिंह ही बाबू कुँवर सिंह के प्रधान परामर्शदाता थे। जब अमर सिंह ने अपने भाई को अँग्रेज़ों से संघर्ष करते हुए देखा, तो वे भी अँग्रेज़ विरोधी कैंप में शामिल हो गए। जगदीशपुर छोटी रियासत होते हुए भी उसका प्रभाव बिहियाँ आदि स्थानों पर था। सम्राट शाहजहाँ ने जगदीशपुर के ज़मींदार को 'राजा' की उपाधि प्रदान की थी। जगदीशपुर के अंतिम शासक राजा अमर सिंह ही थे। कुँवर सिंह के गद्दी छोड़ने के बाद बिहार में अमर सिंह ने आठ महीनों तक क्रांति का नेतृत्व किया। उस समय कुँवर सिंह उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में लड़ने में व्यस्त थे। अमर सिंह ने पहाड़ी क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ना प्रारंभ किया और कंपनी के विरुद्ध छापामार युद्ध जारी रखा एवं सासाराम के बीच आवागमन के मार्ग को अमर सिंह ने अवरूद्ध कर दिया। सासाराम के आस-पास के क्षेत्रों पर अमर सिंह का दबदबा बहुत बढ़ गया। पटना के कमिश्नर ने बंगाल सरकार के सचिव को 6 सितम्बर, 1857 ई. को पत्र लिखा कि जब तक अमर सिंह को आस-पास के क्षेत्रों में रहेगा, तब तक आरा ज़िले में शांति कभी स्थापित नहीं सकती। यह भी संभव है कि आरा पर पुनः विद्रोहियों का अधिकार हो जाए। यदि आरा में पुनः विद्रोही पनप गए, तो वह पटना, गया तथा संपूर्ण बिहार के लिए एक सिरदर्द हो जाएगा। सरकार ने घोषणा की कि जो कोई अमर सिंह को पकड़वाएगा, उसे दो हज़ार रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा, जिसे बाद में बढ़ाकर पाँच हज़ार रुपये कर दिया गया था। निशांत सिंह और हरकिशन सिंह को पकड़ने के लिए सरकार ने क्रमशः एक हज़ार एवं पाँच सौ रुपये देने की घोषणा की। ग्रैण्ड ट्रंक रोड के निकट कुरीडीह में अमर सिंह ने टेलिफ़ोन लाइन काट दी और पहाड़ियों की ओर चले गए। दक्षिण शाहाबाद में कुछ माह तक अमर सिंह ने गुरिल्ला युद्ध में अँग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए। अमर सिंह की रणनीति अँग्रेज़ों के लिए बहुत धातक सिद्ध हुई। अधिकांश स्थानों पर अमर सिंह ने अँग्रेज़ों को पराजित किया। यदि उन्हें पता चलता कि अँग्रेज़ों की विजय निश्चित है, तो वे अपनी सेना को छोटे-छोटे दलों में बाँटकर अनेक पूर्व निश्चित दिशाओं में भेज देते। इस तरह अमर सिंह की सेना देखते ही देखते ग़ायब हो जाती और अँग्रेज़ सेना उसका पीछा करके कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाती। अँग्रेज़ हमेशा यही सोचते थे कि इस अदृश्य सेना का मुक़ाबला कैसे किया जाए। प्रत्येक लड़ाई में अँग्रेज़ों को अपनी विजय निश्चित लगती थी, पर वे विजय प्राप्त नहीं कर पाते थे। इस प्रकार दूसरे स्थल पर उन्हें फिर अमर सिंह की शक्तिशाली सेना से युद्ध करना पड़ता था। अमर सिंह के युद्धकौशल एवं वीरता से निराश होकर ब्रिटिश जनरल ई. लूगार्ड ने 17 जून तो त्यागपत्र दिया और इंग्लैंड वापस चला गया। उसके स्थान पर जनरल डगलस को नियुक्त किया गया। उसकी सेना भी युद्ध क्षेत्र छोड़कर वापस शिविर में चली गई। अमर सिंह की मुठभेड़ सर ई. लुगार्ड के साथ हुई। लूगार्ड ने आरा से बिहिया की ओर प्रस्थान किया। जहाँ अमर सिंह के कुछ लोगों ने उन्हे बाधा पहुँचाने का प्रयास किया, पर उसने उन लोगों को जंगल में खदेड़ दिया। अमर सिंह और लूगार्ड के बीच पुनः जगदीशपुर में लड़ाई हुई, परंतु यहाँ भी विद्रोही सेना को जंगल की ओर भागने के लिए विवश होना पड़ा। जगदीशपुर पर अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए लूगार्ड ने चार युरोपियन टुकड़ी और एक सिक्खों की कंपनी को कैप्टन नार्मन के नेतृत्व में रखा। 10 मई को यह सूचना प्राप्त हुई कि कर्नल कोरफील्ड पीरो में आ रहा है। 13 मई को जब लुगार्ड पीरों में विश्राम कर रहा था, तब अमर सिंह की सेना ने अँग्रेज़ सेना को परास्त करके उनके कैंप में तहलका मचा दिया। लूगार्ड ने 14 मई को जगदीशपुर से सेना के प्रधान को लिखा कि अँग्रेज़ सेना गर्मी से बहुत परेशान हो चुकी है और उसे बहुत क्षति उठानी पड़ी है। अब मैं विद्रोहियों पर अधिकार करने या भगाने में असमर्थ हूँ। 15 मई को अमर सिंह के सैनिकों ने लूगार्ड की सेना पर आक्रमण कर दिया, परंतु अँग्रेज़ सैनिक जगदीश पुर के दक्षिण जंगल की ओर भाग गए। 16 मई को अँग्रेज़ सैनिकों ने हरकिशन गाँव में आग लगाकर उसे बरबाद कर दिया। ब्रिटिश सेना ने अमर के मकान को भी नष्ट कर दिया। 20 मई को लूगार्ड तथा अमर सिंह के बीट मेटाही में मुठभेड़ हुई। डगलस के साथ भी अमर सिंह का संघर्ष हुआ, जिसमें अँग्रेज़ सेना ने उन्हें पीछे हटने किए विवश किया, पर वह उन पर कब्जा न कर सकी। इस घटना के अमर सिंह हताश नहीं हुए। उन्होंने साहस से काम लेते हुए संघर्ष जारी रखा। वे 7 जून को कर्मनाशा नदी पार कर गहमर होते हुए गाजीपुर जिला के जमानियाँ परगना में पहुँचे। जनरल ई. लूगार्ड ने कैप्टन रैटरे को रूपसागर में एवं ब्रिगेडियर डगलस को बक्सर में और स्वयं दलीपपुर में रहा, ताकि अमर सिंह शाहाबद में न आ सके। परंतु इसके बावजूद अमर सिंह 1,500 सैनिकों सहित जंगलों को पार करके जगदीशपुर के निकट मदनपुर आ गए। 12 जून को अमर सिंह की कैप्टन रैटरे की सेना के साथ मुठभेड़ हुई, जिसकी सूचना सरकार को नहीं दी गई | नाना साहब के नेपाल चले जाने के बाद अक्टूबर, 1859 में अमर सिंह तराई चले गए। वहाँ पहुँचने के बाद उन्होंने नाना साहब की सैनिक टुकड़ी का नेतृत्व सँभाल लिया। दामोदर सावरकर के अनुसार अमर सिंह कैमूर की पहाड़ियों को पार करते हुए कहीं अन्यत्र निकल पड़े। वे शत्रुओं के हाथों नहीं पकड़े गए। राज्य और वैभव ने उनका साथ छोड़ दिया, किंतु उनकी अजेय आत्मा उनके साथ रही। उन्होंने अंतिम क्षणों तक साहस नहीं छोड़। पर उनके अन्तिम दिन कहाँ और कैसे बीते, इसका कोई उत्तर नहीं है। COURTESY: 'KRANTIKARI KOSH' Edited by Shrikrishna Saral & Published by Prabhat Prakashan http://www.kranti1857.org/

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